नई टिहरी()। आईआईटी रुड़की में कृषि विज्ञान के विभााध्यक्ष प्रो. आशीष पांडेय के मार्गदर्शन में जर्मनी और श्रीलंका के कृषि विशेषज्ञ, प्रोफेसर और शोधार्थी छात्रों का एक दल बीज बचाओ आंदोलन की जानकारी लेने जड़धार गांव पहुंचा। दल के सदस्यों ने नागणी हेंवल घाटी में स्थित बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी से खेत में जाकर मुलाकात की। टीम ने हेंवलघाटी के चिपको आंदोलन, खनन विरोधी आंदोलन और बीज बचाओ आंदोलन के बारे में जानकारी हासिल की। हेंवलघाटी पहुंचे जर्मनी के केल विवि की प्रो. निकोला परहर ने उत्तराखंड की पारंपरिक, टिकाऊ, जैविक और बारहनाजा की मिश्रित खेती, पशुपालन और जंगल संरक्षण के तौर- तरीकों को समझते हुए यहां के किसानों का आभार प्रकट किया। उन्होंने बताया कि दुनिया को स्वस्थ रखने और पर्यावरण पारिस्थितिकी को बचाने के इस संदेश को वह अपने देश के लोगों और छात्रों को पढ़ाएगी। इसी तरह पड़ोसी देश श्रीलंका के रूटुना विवि के प्रो. विक्रमाची और डॉ. हेंगमा लियांग ने कहा कि बीज बचाओ आंदोलन टिकाऊ खेती के लिए विविध तरह के बीजों का संरक्षण और जैविक पद्धतियों का जो काम कर रहा है, वह सिर्फ भारत के लिए नहीं पूरी दुनिया के भविष्य का संदेश है। आईआईटी रुड़की के विभागाध्यक्ष प्रो. आशीष पांडेय ने बताया कि बीज बचाओ आंदोलन की विविधता का खजाना पारंपरिक बीजों का संकलन और धरातल पर खेती के प्रयोग को देखते हुए उसका लाभ शोधार्थियों तक कैसे पहुंचे इस कार्य में मदद करने का प्रयास कर रहे हैं।