डिजिटल भारत के दावों के बीच नेटवर्क विहीन लाहुर घाटी—दर्जनों गाँव आज भी संचार से कटे

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बागेश्वर । उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद की गरुड़ तहसील स्थित लाहुर घाटी आज भी बुनियादी दूरसंचार सुविधाओं के अभाव में संघर्ष कर रही है। जाख, हड़बाड़, पन्द्रपाली समेत दर्जनों गाँवों के ग्रामीण कमजोर नेटवर्क कनेक्टिविटी के कारण दैनिक जीवन में गंभीर कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। विडंबना यह है कि डिजिटल क्रांति के इस दौर में भी यह क्षेत्र प्रभावी संचार व्यवस्था से वंचित है। क्षेत्र में स्थापित बीएसएनएल का टॉवर केवल सीमित रूप से 4G सिग्नल ही उपलब्ध करा पा रहा है, जिससे सामान्य की-पैड फोन उपयोग करने वाले ग्रामीणों के लिए संपर्क साधना लगभग असंभव हो जाता है। परिणामस्वरूप, ग्रामीण न तो समय पर आवश्यक सूचनाएं प्राप्त कर पाते हैं और न ही आपातकालीन परिस्थितियों में सहायता के लिए संपर्क स्थापित कर पाते हैं। स्थिति आपदा के समय और भी विकट हो जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन, भारी वर्षा और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान संचार व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाती है, जिससे राहत एवं बचाव कार्यों में भी बाधा उत्पन्न होती है। कई बार ग्रामीणों को घंटों, बल्कि दिनों तक बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं मिल पाता, जो उनकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन जाता है। ग्राम प्रधान क्लारौ राजू दानू ने इस समस्या पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि क्षेत्र की जनता को केवल चुनावी समय में ही महत्व दिया जाता है, जबकि मूलभूत सुविधाओं की ओर कोई ठोस ध्यान नहीं दिया जाता। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि क्षेत्र में सुदृढ़ नेटवर्क व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि ग्रामीणों को राहत मिल सके। वहीं स्थानीय निवासी नवीन जोशी ने बताया कि इस नेटवर्क संकट का सबसे अधिक दुष्प्रभाव बुजुर्गों और महिलाओं पर पड़ता है। की-पैड फोन में नेटवर्क न आने के कारण वे आपात स्थिति में भी अपने परिजनों या स्वास्थ्य सेवाओं से संपर्क नहीं कर पाते, जिससे उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं। लाहुर घाटी के ग्रामीण वर्षों से बेहतर दूरसंचार सुविधा की मांग कर रहे हैं, किंतु अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर कब तक यह क्षेत्र विकास के दावों के बीच उपेक्षित बना रहेगा और कब तक यहां के लोग संचार जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष करते रहेंगे।

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