देहरादून) । दीपावली के ग्यारह दिन बाद आने वाली एकादशी को उत्तराखंड में एक बार फिर दीपों और उल्लास का पर्व ईगास-बग्वाल पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा । घर-आंगन में दीपक और रंग-बिरंगी रोशनी की जगमगाहट के साथ लोग वीरता और परंपरा का यह पर्व मनाते हैं। ईगास पर लक्ष्मी पूजा नहीं, बल्कि वीरभद्र माधो सिंह भंडारी की युद्ध विजय की स्मृति में उत्सव मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन घरों में पारंपरिक व्यंजन बनते हैं और साहस एवं उत्साह का प्रतीक भैलो खेला जाता है। ढोल-दमाऊ की थाप पर बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग- मिलकर गीत गाते हैं- > ह्लभैलो रे भैलो, काखड़ी को रैलू, उज्यालू आलो अंधेरो भागलोङ्घह्व यह पर्व बूढ़ी दीवाली, हरिबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
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ईगास से जुड़ी मान्यता
किंवदंती है कि भगवान राम के अयोध्या लौटने का समाचार गढ़वाल क्षेत्र में 11 दिन बाद पहुंचा था। जब लोगों को यह खबर मिली, तो उन्होंने 11 दिन बाद दीपावली मनाई- यही ईगास कहलाया।
हालांकि, अधिकांश इतिहासकार इसे सन् 1632 की घटना से जोड़ते हैं। उस समय गढ़वाल नरेश राजा महिपत शाह के शासनकाल में तिब्बत युद्ध हुआ था। वीर सेनापति माधो सिंह भंडारी युद्ध में विजय प्राप्त कर 11 दिन बाद लौटे, तब उनके स्वागत में भैलो खेला गया और तभी से यह परंपरा शुरू हुई।
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क्या है ह्यभैलोह्ण
भैलो बनाने में चीड़ के पेड़ की लाल रंग की अतिज्वलनशील लकड़ी, जिसे छिल्ला कहा जाता है, का उपयोग किया जाता है। इसे बारीक लम्बाई में काटकर बब्लू घास से बनी रस्सी से बांधा जाता है। रस्सी के एक सिरे को खुला छोड़ दिया जाता है ताकि खेल के दौरान इसे घुमाया जा सके।
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खेल का रोमांच और सावधानी
गांव की चौपालों में सब अपने-अपने भैलों को जलाते हैं। इसके बाद लोग खेतों में जाकर ढोल-दमाऊ की थाप पर जलते भैलों को गोल-गोल घुमाते हैं। यह दृश्य अत्यंत आकर्षक होता है, लेकिन थोड़ा जोखिम भरा भी। जिन्हें यह खेल नहीं आता, वे अक्सर दूर से ही इसका आनंद लेते हैं ताकि जलने का खतरा न रहे।
इस दिन गांव-गांव में ह्लभैलोह्व की आग और लोक संगीत की गूंज हर दिशा में सुनाई देती है-जो उत्तराखंड की वीरता, लोकसंस्कृति और सामूहिकता का प्रतीक है