विकासनगर। जौनसार में इन दिनों बूढ़ी दीवाली की तैयारियां जोरों पर हैं। करीब दो सौ गांवों में 19 नवंबर से इस त्योहार का जश्न शुरू हो जाएगा और गांव के पंचायती आंगनों में लोक संस्कृति की झलक दिखाई देगी। पांच दिवसीय इस पर्व के नजदीक आते ही स्थानीय बाजार भी गुलजार हो गए हैं। इन दिनों नौकरी-पेशा लोगों के पैतृक गांव लौटने के चलते सवारी वाहन भी पूरी तरह ओवरलोड चल रहे हैं। पर्व के चलते शनिवार को साहिया बाजार में खरीदारी के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण उमड़े। जौनसार के अधिकांश गांवों में अभी भी बूढ़ी दीपावली मनाने का ही रिवाज है। पांच दिन तक पंचायती आंगन जौनसार की अनूठी लोक संस्कृति से गुलजार रहते हैं। बूढ़ी दीवाली के चलते स्थानीय बाजारों में भी रौनक आ गई हैं। देहरादून जिले की तीन तहसीलों कालसी, चकराता और त्यूणी और दो विकास खंड कालसी और चकराता में बंटा जनजाति क्षेत्र जौनसार-बावर अपनी अनूठी लोक संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। यहां के तीज-त्योहार, शादी समारोह को मनाने के तरीके भी निराले हैं। देशभर में मनाई जाने वाली दीपावली के ठीक एक माह बाद जनजाति क्षेत्र में पांच दिन की बूढ़ी दीपावली मनाने का रिवाज है। पर्व के इस मौके पर जौनसार के गांवों में हर घर से विशेष व्यंजन चिउड़ा मूड़ी की सुगंध उठ रही है। इस त्योहार की विशेष बात यह है कि इसे ईको फ्रेंडली तरीके से मनाया जाता है। यहां पर पटाखे नहीं जलाए जाते। पूरी तरह से प्रदूषण रहित दीवाली मनाने के साथ ही परंपराओं का भी पूरा ख्याल रखा जाता है। —– पांच दिनों तक मनाए जाते हैं अलग-अलग पर्व दीपावली के पांच दिनों की शुरुआत छोटी होलियात से होती है। इसके दूसरे दिन बड़ी होलियात मनाई जाती है, जिसके तहत ग्रामीण पंचायती आंगनो में मशालें जलाकर होलियात खेलते हैं। तीसरे दिन भिरुड़ी पर्व मनाया जाता है, इसमें गांव का स्याणा प्रसाद के तौर पर अखरोट ग्रामीणों के समूह में फेंकते हैं। इसके बाद जेंदोई मनाई जाती है, जबकि अंतिम दिन काठ के हाथी और हिरण नृत्य के साथ दीपावली पर्व का समापन किया जाता है।