नई दिल्ली , भारत की अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के साथ हो रही बड़ी ट्रेड डील्स की चर्चा पूरी दुनिया में है। यूरोपियन यूनियन के साथ समझौते को जहां अहम माना जा रहा है, वहीं अमेरिका के साथ बातचीत भी सुर्खियों में है। लेकिन, भारत को अगला सुपरपावर बनाने की दिशा में असली गेमचेंजर कदम अब उठाया जा रहा है। मोदी सरकार दक्षिण अमेरिका के अहम देश चिली के साथ एक बड़ा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (स्नञ्ज्र) फाइनल करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। माना जा रहा है कि यह समझौता भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को जबरदस्त पंख लगाएगा।
चीन के एकाधिकार को तोड़ने की तैयारी
आज की तेजी से बदलती ग्लोबल इकॉनमी में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ पूंजी नहीं, बल्कि क्रिटिकल मिनरल्स जैसे संसाधनों की सबसे ज्यादा जरूरत है। लिथियम, कॉपर, कोबाल्ट, रीनियम और मॉलीब्डीनम जैसे खनिज अब केवल इंडस्ट्रियल इनपुट्स नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्ति बन चुके हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (श्वङ्क), रिन्यूएबल एनर्जी और अत्याधुनिक मैन्यूफैक्चरिंग के लिए ये खनिज ऑक्सीजन के समान हैं। फिलहाल इन खनिजों की ग्लोबल सप्लाई चेन पर चीन का लगभग पूरा कब्जा है और उसने कई बार इस वर्चस्व का इस्तेमाल हथियार की तरह कर अन्य देशों की सप्लाई बाधित करने की कोशिश की है। ऐसे में भारत के लिए चीन पर अपनी निर्भरता खत्म करना बेहद जरूरी है। चिली के साथ होने वाली यह डील इसी दिशा में भारत का एक बड़ा और बेहद ठोस कदम है।
चिली के पास खनिजों का बेहिसाब खजाना
चिली केवल एक साधारण व्यापारिक भागीदार नहीं है; यह क्रिटिकल मिनरल्स के मामले में दुनिया का एक पावरहाउस है। सबसे बड़ी बात यह है कि चिली के पास आधुनिक दुनिया को चलाने वाले लिथियम का विशाल भंडार है। स्मार्टफोन की बैटरी से लेकर इलेक्ट्रिक कारों और बड़े एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स तक, हर जगह लिथियम की जरूरत है। इतना ही नहीं, चिली दुनिया में कॉपर (तांबे) का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और दुनिया का करीब 23 फीसदी कॉपर यहीं की खदानों से निकलता है। इसके अलावा, वैश्विक जरूरत का 20 फीसदी लिथियम उत्पादन कर यह ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरे नंबर पर है। वहां रीनियम, मॉलीब्डीनम और कोबाल्ट भी प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं, जो भारत के ‘मेक इन इंडियाÓ और क्लीन एनर्जी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए वरदान साबित होंगे।
सिर्फ व्यापार नहीं, अब साझेदारी का नया दौर
भारत और चिली के रिश्ते नए नहीं हैं। साल 2006 में दोनों देशों के बीच हुए ‘प्रीफेरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंटÓ ने इन संबंधों की मजबूत नींव रखी थी। लेकिन अब बातचीत का दायरा काफी व्यापक हो चुका है। अब चर्चा केवल कुछ सामानों पर टैक्स कम करने की नहीं है, बल्कि एक ‘कंप्रहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंटÓ (ष्टश्वक्क्र) पर मुहर लगने वाली है। इस नए समझौते में व्यापार, डिजिटल सर्विसेज, निवेश और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में सीधा सहयोग शामिल है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी इसके जल्द फाइनल होने के संकेत दिए हैं। आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में चिली से भारत का आयात 72 फीसदी की भारी उछाल के साथ 2.60 अरब डॉलर पर पहुंच गया है, जो स्पष्ट करता है कि भारतीय इंडस्ट्री को चिली के कच्चे माल की कितनी सख्त जरूरत है।
प्राइवेट कंपनियों ने भी कसी कमर
सरकार के इस महा-अभियान में भारत का प्राइवेट सेक्टर भी पीछे नहीं है और वह इस सुनहरे मौके को भुनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। भारतीय कंपनियां अब सीधे चिली में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। हाल ही में कोल इंडिया के बोर्ड ने चिली में एक होल्डिंग कंपनी बनाने को मंजूरी दी है, जो वहां क्रिटिकल मिनरल्स की संभावनाएं तलाशेगी। वहीं, अडानी ग्रुप ने भी एक बड़ा कदम उठाते हुए पिछले साल नवंबर में चिली की सरकारी कंपनी ष्टशस्रद्गद्यष्श के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया था। इस करार का मुख्य मकसद चिली में कॉपर प्रोजेक्ट्स का एक्सप्लोरेशन और डेवलपमेंट करना है, जिसके तहत तीन बड़े कॉपर प्रोजेक्ट्स का गहन रिव्यू किया जाएगा।