पबसोला गांव की बुजुर्ग दानवीर माता कपोत्री देवी ब्रह्मलीन

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राइंकॉ मुंडनेश्वर के विकास में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
जगमोहन डांगी।
पौड़ी : कल्जीखाल विकासखंड के ग्राम पबसोला की रहने वाली प्रमुख समाजसेवी दानवीर माता बुजुर्ग 95 वर्षीय कपोत्री देवी का शनिवार को ऋषिकेश में स्वर्गवास हो गया है। बुजुर्ग माता कपोत्री देवी विगत एक दशक से अपने परिवार के सदस्यों के साथ ऋषिकेश में रह रही थी। उनके निधन की सूचना से असवालस्यूं क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। बता दें कि राजकीय इंटर कॉलेज मुंडनेश्वर के विकास में श्रीमती कपोत्री देवी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कॉलेज में फर्नीचर से लेकर कक्षा-कक्ष के निर्माण में सहयोग देती थीं और विद्यालय में होने वाले सांस्कृतिक कार्यकमों में बच्चों को पुरस्कृत करती थी।
मात्र तेरह साल की उम्र में डोली सजी और दो साल में ही वैवाहिक जीवन का सूर्य अस्त भी हो गया। सात भाई बहिनों के भरे पूरे परिवार में उस वक्त आखर का ज्ञान नसीब नहीं हो पाया, लेकिन पति की मौत के बाद वह पूरे क्षेत्र के लिए शिक्षा की संवाहक ही नहीं अंनपूर्णा भी बन गई। कपोत्री देवी बीते आठ दशक तक पेंशन की एक-एक पाई क्षेत्र के शिक्षण संस्थाओं को संवारने और उनमें छात्रों के लिए संसाधन जुटाने पर खर्च करती थीं। अपनी गुजर खेती बाड़ी से करती थी और उसका भी एक हिस्सा जरूरतमंदों को दान करती थीं। कपोत्री देवी क्षेत्र की महिलाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत की पुंज थी। क्षेत्र के जाने माने बुजुर्ग कृषक डॉ. विद्यादत्त शर्मा बताते है कपोत्री देवी एक तपस्विनी थी, 1982 में मुंडेश्वर विद्यालय को उच्चीकरण करवाने में उनका बहुत योगदान रहा। उन्होंने अनशन किया और जल तक ग्रहण नहीं किया, वह समाजिक कार्यों में मातृशक्ति के नेतृत्व में वह हमेशा हमारी साथ एक अग्रणीय भूमिका में रही है। चकबंदी के प्रेणता गणेश सिंह गरीब बताते है कि कपोत्री देवी एक कर्मयोगी महिला थी, जीवन भर जरूरतमंदों की सेवा के लिए समर्पित रही। उन्होंने अपने स्वर्गीय पति की मिलने वाली पेंशन से मुंडेश्वर विद्यालय ही नहीं आसपास के सभी विद्यालयों में सहयोग किया, उनके संसार छोड़ने से क्षेत्र को अपूर्णीय क्षति हुई है। समाजिक कार्यकर्ता पबसोला निवासी दिनेश खर्कवाल बताते है कि वह बड़ी परिश्रमी महिला थी, उन्हें खेती से बहुत प्रेम था, वह अपनी खेती का अन जरूरतमंदों को दान कर देती थी। उनकी कोई संतान नहीं थी। विगत एक दशक से गांव के परिवार के सदस्यों के साथ ऋषिकेश में रहती थी।

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