उत्तराखंड में सिविल जज के पदों पर पदोन्नति में प्रदान की गई छूट,

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देहरादून। प्रदेश में आखिरकार सिविल जज के रिक्त पदों को पदोन्नति से भरने के लिए उम्मीदवारों की पात्रता निर्धारित कर दी गई। साथ ही अर्हकारी सेवा अवधि में टूट प्रदान करने के लिए नियमावली में संशोधन को सरकार की मंजूरी मिल चुकी है।
प्रदेश में उत्तराखंड न्यायिक सेवा (संशोधन) नियमावली में 2016 के बाद संशोधन किया गया है। इससे पहले 30 अगस्त, 2005 में उत्तराखंड न्यायिक सेवा नियमावली लागू की गई थी। इसमें राज्य में न्यायिक सेवा में भर्ती के स्रोत, अर्हताएं, आयु, योग्यता, पदोन्नति, स्थायीकरण, वेतनमान, ज्येष्ठता आदि सेवा शर्तें निर्धारित की गईं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आल इंडिया जजेज एसोसिएशन वाद-2002 एवं मलिक मजहर सुल्तान वाद-2008 में पारित निर्णयों को देखते हुए इस नियमावली में 26 मई, 2016 में संशोधन किया गया था।
अब नैनीताल हाईकोर्ट ने दो अगस्त, 2021 को उत्तराखंड न्यायिक सेवा में कार्यरत अधिकारियों के लिए कार्य की मात्रा की गणना को नई विधि प्रख्यापित की गई है। इसके आधार पर न्यायिक अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले कार्यों के लिए अलग-अलग इकाइयां निर्धारित की गई हैं। साथ ही सिविल जज के रिक्त पदों को पदोन्नति से भरने के लिए नियमावली में संशोधन किया गया है। इस नियमावली पर कार्मिक विभाग की ओर से मंत्रिमंडल की मुहर लगवाई जा चुकी है।
नियमावली में संशोधन के अनुसार अब पदोन्नति के लिए ऐसे अभ्यर्थियों को पात्र समझा जाएगा, जिन्होंने बीते पांच वर्षों की सेवा में कम से कम तीन वर्षों की अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायिक अधिकारियों के लिए निर्धारित न्यायिक कार्यों का निर्वहन संतोषजनक तरीके से किया है। हाईकोर्ट के अनुसार उनका खराब मूल्यांकन नहीं किया गया हो। ऐसे में पात्रता का क्षेत्र पदोन्नति से भरी जाने वाली रिक्तियों की संख्या के तीन गुना तक सीमित होगा।
यदि पांच वर्षों की अवधि में सिविल जज (कनिष्ठ श्रेणी) के संवर्ग के अधिकारी को किसी ऐसे पद पर प्रतिनियुक्त किया गया है, जहां संतोषजनक परिणाम अथवा मात्रक के निर्देश लागू नहीं होते हों तो ऐसे मामलों में निर्धारित पात्रता को मुख्य न्यायाधीश जिस सीमा तक चाहें शिथिल कर सकते हैं।

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