चमोली : पशुपालन के क्षेत्र में श्वेत क्रांति को बढ़ावा देने व महिलाओं की जंगलों पर निर्भरता समाप्त करने के उद्देश्य से लागू की गई मुख्यमंत्री घस्यारी योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। वर्तमान में जंगली जानवरों के खौफ से लोग जंगल जाने से कतरा रहे हैं। नौबत ऐसी आ गई है कि काश्तकारों के सामने पशुओं को का घोर संकट पैदा हो गया है। प्रगतिशील किसान विजया गुसाईं, कंचन कनवासी, जशदेई कनवासी, बमोथ के पूर्व प्रधान प्रकाश रावत, क्वींठी के कमल रावत आदि पशुपालकों का कहना है कि घस्यारी योजना के तहत हरी घास व भूसा न मिलने से उनके सामने पशुओं के भरण पोषण का भी संकट पैदा हो गया है। पहाड़ी क्षेत्रों में दुग्ध उत्पादकता की क्षमता बढ़ाकर लोगों को श्वेत क्रांति के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने व महिलाओं की जंगलों पर निर्भरता समाप्त करने के लिए पिछले कुछ साल पहले केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह के हाथों देहरादून में मुख्यमंत्री घस्यारी योजना का शुभारंभ करवाया गया था। तब उम्मीद की जा रही थी कि दो रुपए किलो मिलने वाले इस हरी घास से लोगों की मुस्किलें काफी हद तक आसान हो जाएंगी। लेकिन कारण जो भी हो कास्तकारों को इस योजना के तहत मिलने वाली हरी घास उपलब्ध न कराए जाने से उनके सामने दुग्ध उत्पादन के अलावा पशुओं के भरण पोषण का भी संकट पैदा हो गया है। वर्तमान में में लंबे समय से गुलदार व भालुओं के आतंक को देखते हुए ग्रामीण महिलाएं जंगल जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हैं। पशुपालन विभाग के माध्यम से मिलने वाला भूसा कुछ सालों तक नियमित रूप से उपलब्ध कराया जाता था। लेकिन पिछले दो तीन सालों से इस भूसे की कीमत चार गुनी बढ़ाने के बावजूद भी भूसा उपलब्ध नहीं हो रहा। ऐसी दशा में पहाड़ का पशुपालक गंभीर संकट में फंस गया है। ऐसे में पशुपालक अपने दुधारू जानवरों को औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर हैं। (एजेंसी)