ऋषिकेश(। परमार्थ निकेतन में विदेशी सैलानियों का आना शुरू हो गया है। वह अगले तीन माह भारत की आध्यात्मिक विरासत, सनातन संस्कृति और मानवीय मूल्यों के वैश्विक विस्तार का ज्ञान लेने आ रहे हैं। वह आश्रम में पर्यावरण संरक्षण, गंगा स्वच्छता, प्लास्टिक मुक्त अभियान और सेवा कार्यों में भी भागीदारी करेंगे। विदेशी सैलानी यहां योग, ध्यान, प्राणायाम, वेदांत, आयुर्वेद और भारतीय जीवन-दर्शन को निकट से अनुभव करने आते हैं। अनेक देशों से आए सैलानी यहां के योग शिविरों, सत्संग, गंगा आरती और साधना कार्यक्रमों में भाग लेकर आत्मिक शांति और जीवन के अर्थ की खोज करते हैं। परमार्थ निकेतन उनके लिए केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि आत्म-परिवर्तन की प्रयोगशाला है। विदेशी सैलानी भारतीय संस्कृति को केवल पुस्तकों के माध्यम से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में आत्मसात करते हैं। वे भारतीय जीवन शैली, सादगी, सेवा, करुणा और प्रकृति के प्रति सम्मान को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा लेकर लौटते हैं। परमार्थ निकेतन में प्रतिदिन होने वाली प्रसिद्ध गंगा आरती विदेशी सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। जब वे दीपों की ज्योति, वैदिक मंत्रों की ध्वनि और गंगा की पवित्र धारा के साथ जुड़ते हैं, तो उनके भीतर एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति जागृत होती है। अनेक विदेशी अतिथि इस क्षण को अपने जीवन का अविस्मरणीय अनुभव बताते हैं। स्वामी चिदानंद सरस्वती ने बताया कि परमार्थ निकेतन में विदेशी सैलानियों का आगमन एक वैश्विक चेतना का प्रतीक है, जहां सीमाएं मिटती हैं। संस्कृतियां जुड़ती हैं और मानवता एक सूत्र में बंधती है। यह आश्रम भारत की सनातन परंपरा को विश्व के हृदय तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम बन चुका है, और आने वाले समय में इसकी भूमिका और भी व्यापक एवं प्रभावशाली होगी।