श्रीनगर गढ़वाल : बैकुंठ चतुर्दशी के बाद यह पर्व मंदिर का दूसरा सबसे बड़ा आयोजन है। महंत 108 आशुतोष पुरी ने बताया कि घृत कमल गढ़वाल की सदियों पुरानी परंपरा है। राजकाल में गढ़नरेश की ओर से कमलेश्वर महादेव मंदिर को समर्पित 64 गुंठ गांव इस अनुष्ठान से जुड़े थे। घृत कमल के अवसर पर इन गांवों से अंचला सप्तमी के रूप में गेहूं, मंडुवा, तिल व अन्य अनाज लाए जाते थे। इन्हीं अन्नों से भगवान भोलेनाथ के लिए व्यंजन तैयार कर भोग अर्पित किया जाता था। आज भी उस दौर के पारंपरिक बर्तन मंदिर में सुरक्षित हैं। महंत ने बताया कि यह परंपरा चमोली, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून पांच जिलों के 64 गांवों से जुड़ी रही और 1872 तक निभाई जाती रही। उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तर भारत में कमलेश्वर महादेव मंदिर एकमात्र ऐसा स्थान है जहां घृत कमल का यह दुर्लभ अनुष्ठान आज भी होता है। (एजेंसी)