उपचुनावों में मुख्यमंत्रियों के सामने जमानत बचाने को संघर्ष करते दिखे प्रत्याशी

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चम्पावत । उत्तराखंड में मुख्यमंत्री घोषित होने के बाद अब तक हुए चार उपचुनावों में जनता ने सीएम को प्रचंड बहुमत से जिताया है। सीएम के सामने खड़े मुख्य अधिकतर प्रत्याशी जमानत तक नहीं बचा पाया। मुख्यमंत्री के रूप में चम्पावत से पांचवा उपचुनाव लड़ रहे पुष्कर धामी के लिए चुनाव जीतना चुनौती नहीं है। उनको इस अंदाज में जीतना है जैसे आज तक कोई नहीं जीता। और यही जीत आने वाले समय में पार्टी उनके कद का भी आंकलन करेगा। धामी चुनाव लड़ रहे ऐसे पहले मुख्यमंत्री है जिसने चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
उत्तराखंड अलग प्रदेश बनने के बाद पहले विधानसभा चुनाव वर्ष 2002 में हुए। चुनाव में जनता ने कांग्रेस को बहुमत के आंकड़े तक पहुंचाया। तब कांग्रेस को 36 सीटें मिली और भाजपा को 29 सीटों पर ही संतोष संतोष करना पड़ा। हाईकमान ने कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी को प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। मुख्यमंत्री बनने के बाद नारायण दत्त तिवारी ने रामनगर सीट से उपचुनाव लड़ा। उनके लिए कांग्रेस के विधायक योगम्बर सिंह ने सीट छोड़ी। नारायण दत्त तिवारी 66़88: मत पाकर विजयी रहे।उन्हें 32913 मत मिले जबकि भाजपा प्रत्याशी राम सिंह बिष्ट को 9693 मत मिले। तिवारी 23 हजार मतों से विजयी रहे।
इसके बाद 2007 में प्रदेश में दूसरे विधानसभा चुनाव में इस विधानसभा चुनाव में जनता ने किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया। भाजपा बहुमत से मात्र एक सीट पीटे रह गई। भाजपा को 35 सीट व कांग्रेस को 21 सीटें ही मिली। भाजपा ने सरकार बनाने का दावा किया। मुख्यमंत्री पर विधायकों में एकमत नहीं होने पर पार्टी ने भुवन चंद खंडूरी को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। इसके बाद उन्होंने धुमाकोट विधानसभा से चुनाव लड़ा। तब उनके लिए धूमाकोट विधानसभा से सीट खाली करने वाले कांग्रेस के विधायक टीपीएस रावत थे। भुवन चंद्र खंडूरी 14 हजार से भी अधिक मतों से जीतने में सफल रहे उन्हें 70़ 66: मत मिले।
इसके बाद 2012 में राज्य में तीसरे विधानसभा चुनाव में इस बार जनादेश पूरी तरह अस्पष्ट रहा। कांग्रेस को 32 भाजपा को एक 31 सीट मिली तब कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा किया। निर्दलीय, क्षेत्रीय दल, व बसपा के समर्थन से कांग्रेस ने प्रदेश में सरकार बनाई। मिलीजुली सरकार में कांग्रेस हाईकमान ने विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। उन्होंने सितारगंज विधानसभा से उप चुनाव लड़ा। उनके लिए यह सीट भाजपा के विधायक किरण मंडल ने छोड़ी थी। उपचुनाव में सीएम को सितारगंज की जनता ने विजय बहुगुणा को सिर आंखों पर बिठाया। वह 77़15 मत लाकर जीते। विजय बहुगुणा को 53766 मत मिले। जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंदी प्रकाश पंत को 13800 वोटों पर ही संतोष करना पड़ा।
मिलीजुली सरकार के मुखिया दो साल ही गद्दी संभाल पाएं। वर्ष 2014 में कांग्रेस हाईकमान ने विजय बहुगुणा को हटाकर हरीश रावत को प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए धारचूला के विधायक हरीश धामी ने अपनी सीट छोड़ी। हरीश रावत क्षेत्र में प्रचार के आए बिना ही 20 हजार से अधिक मतों से जीतने में सफल रहे। उन्हें 72़11 प्रतिशत मत मिला।
चौथे आम चुनाव में 2017 में प्रदेश की जनता ने भाजपा को प्रचंड बहुमत दिया। भाजपा को प्रदेश में 56 सीटें और कांग्रेस को 11 सीटें मिलीं। इस बार डोईवाला से विधायक चुने गए त्रिवेंद्र सिंह रावत को सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री चुन लिया गया। चार साल बाद फिर उनकी सत्ता को चुनौती मिली और भाजपा ने चेहरा बदलकर तीरथ सिंह रावत जो कि उस समय पौड़ी के सांसद थे। उनको मुख्यमंत्री बना दिया गया। रावत दो महीने का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाए, चुनाव से ठीक पहले हटा दिया गया और खटीमा से विधायक पुष्कर सिंह धामी को नया मुख्यमंत्री बना दिया।
वर्ष 2022 में प्रदेश का पांचवा विधानसभा चुनाव बीजेपी ने युवा चेहरे पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लड़ा। भाजपा को पूरी उम्मीद थी की डैमेज कंट्रोल करते हुए भाजपा बहुमत से सरकार बनाएगी। भाजपा को एक बार फिर प्रचंड बहुमत मिला। बीजेपी 47 सीट जबकि कांग्रेस को मात्र 19 सीटें ही मिल पाई। इस चुनाव में दिलचस्प चीज यह हुई कि जनादेश तो बीजेपी को मिल गया लेकिन भाजपा का मुख्यमंत्री चेहरा पुष्कर सिंह धामी जो खटीमा से चुनाव लड़ रहे थे वह हार गए। भले ही जनता ने हरा दिया हो लेकिन बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा जताया और उनको फिर मुख्यमंत्री बना दिया। चम्पावत के विधायक कैलाश गहतोड़ी ने अपनी सीट धामी के लिए छोड़ी। अचार संहिता लगने के बाद पिछले एक महीने से सीएम धामी, उनकी पत्नी व पूरा बीजेपी संगठन ने चम्पावत फतेह को पूरी ताकत लगा दी है।

 

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