जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ बड़ी कार्रवाई, श्रीनगर और शोपियां समेत कई जगहों पर मारे छापे

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श्रीनगर , जम्मू-कश्मीर पुलिस की काउंटर इंटेलिजेंस कश्मीर (सीआईके) विंग ने कश्मीर में कई जगहों पर छापे मारे हैं। ये छापे श्रीनगर, शोपियां और गांदरबल में मारे गए। यह मामला हाल ही में सीआईके पुलिस स्टेशन में दर्ज किए गए एक नए आतंकी जांच केस से जुड़ा है। काउंटर इंटेलिजेंस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आईएएनएस को इसकी पुष्टि की है।
पिछले हफ्ते भी बड़ी कार्रवाई करते हुए काउंटर इंटेलिजेंस कश्मीर (सीआईके) विंग ने एक हाई-टेक अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी रैकेट का भंडाफोड़ किया और सात संदिग्धों को गिरफ्तार किया। सीआईके के एक बयान में कहा गया कि एक बड़ी सफलता के तौर पर, काउंटर-इंटेलिजेंस कश्मीर ने एक बेहद हाई-टेक अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क का पर्दाफाश किया और श्रीनगर में संदिग्धों को गिरफ्तार किया।
बयान में कहा गया, सीआईके-सीआईडी को ऐसे गुप्त कॉल सेंटरों के काम करने के बारे में कई तकनीकी और विश्वसनीय इनपुट मिले थे, जो विदेशी और स्थानीय नागरिकों को निशाना बनाकर धोखाधड़ी वाली ऑनलाइन गतिविधियों में शामिल थे। सीआईके ने तुरंत तकनीकी विशेषज्ञों और फील्ड ऑपरेटिव्स की विशेष टीमें गठित कीं और कई जगहों पर व्यवस्थित निगरानी, डिजिटल खुफिया जानकारी जुटाने और सत्यापन का काम किया। आखिरकार, श्रीनगर के रंगरेथ स्थित औद्योगिक क्षेत्र में एक मुख्य ऑपरेशनल हब की पहचान की गई।
इस कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए सीआईके की टीमों ने श्रीनगर शहर के अलग-अलग हिस्सों में त्वरित और सुनियोजित छापेमारी की। छापेमारी के दौरान सात संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया और बड़ी मात्रा में डिजिटल और संचार उपकरण जब्त किए गए, जिनमें 13 मोबाइल फोन, नौ लैपटॉप, वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल सिस्टम, सिम कार्ड, नेटवर्किंग डिवाइस और डिजिटल स्टोरेज मीडिया शामिल थे।
बयान में कहा गया कि इस धोखाधड़ी का तरीका यह था कि आरोपी वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल सिस्टम का उपयोग करके एक गुप्त, गैर-पंजीकृत कॉल सेंटर बनाते थे। इससे वे अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल नंबर जेनरेट कर पाते थे, सर्वर रूटिंग और स्पूफिंग तकनीकों का उपयोग करके अपनी असली लोकेशन छिपा लेते थे, और अनजान पीड़ितों के सामने खुद को वैध सेवा प्रदाता के रूप में पेश करते थे। इस कॉल सेंटर के जरिए अंतरराष्ट्रीय कॉल की जाती थीं और उन्हें रूट किया जाता था। पीड़ितों को निशाना बनाने के लिए एक नकली वेबसाइट और गूगल विज्ञापनों का इस्तेमाल किया जाता था।
कई देशों में मौजूद लोगों से सुनियोजित कॉल ऑपरेशन और ऑनलाइन फिशिंग विज्ञापनों के जरिए संपर्क किया जाता था। जैसे ही कोई पीड़ित विज्ञापन पर क्लिक करता था, उसकी स्क्रीन पर एक टोल-फ्री नंबर दिखाई देता था। संदिग्धों की ओर से संचालित इस टोल-फ्री नंबर का उपयोग करके उन्होंने भोले-भाले लोगों को धोखा दिया और उनसे उनकी बैंकिंग और अन्य व्यक्तिगत जानकारी हासिल कर ली। इसके बाद, धनराशि को विभिन्न खातों में स्थानांतरित किया गया, जिनमें फर्जी खाते और क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट शामिल थे।

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