सबरीमाला में महिलाओं की नो-एंट्री पर अड़ी मोदी सरकार, सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों के सामने दो टूक- ‘आस्था में दखल न दे अदालत

Spread the love

नई दिल्ली , सदियों पुरानी परंपरा और धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा मुद्दा एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। केरल के पवित्र सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को नए सिरे से कानूनी जंग छिड़ गई है। 9 जजों की संविधान पीठ के सामने सुनवाई के पहले ही दिन केंद्र सरकार ने अपना रुख बिल्कुल साफ कर दिया है। सरकार ने दो टूक शब्दों में कहा है कि मासिक धर्म के आयु वर्ग वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
‘भगवान अय्यप्पा ब्रह्मचारी हैं, उनका संप्रदाय बिल्कुल अलग
सबरीमाला विवाद पर दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र ने महिलाओं की एंट्री का कड़ा विरोध किया है। अदालत के समक्ष अपनी दलील पेश करते हुए सरकार ने स्पष्ट किया कि भगवान अय्यप्पा नित्य ब्रह्मचारी हैं और उनके कड़े नियमों के तहत वह महिलाओं से दूर रहते हैं। अय्यप्पा के भक्तों का एक अलग और विशिष्ट संप्रदाय है, जिसके अपने सख्त नियम और परंपराएं हैं। सरकार का तर्क है कि अदालतें लोगों की गहरी आस्था और धार्मिक विश्वास पर फैसला सुनाने का अधिकार नहीं रखती हैं।
साल 2018 के फैसले पर दोबारा विचार करने की अपील
इस अहम सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने साल 2018 में दिए गए उस ऐतिहासिक फैसले पर पुनर्विचार करने का पुरजोर समर्थन किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं के लिए मंदिर के दरवाजे खोल दिए थे। सरकार की ओर से दलील दी गई कि यह मामला केवल महिला-पुरुष की बराबरी या लैंगिक समानता तक सीमित नहीं है। यह सीधे तौर पर सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा और लोगों की अटूट आस्था का विषय है। अदालतों को किसी देवता की प्रकृति या जरूरी धार्मिक प्रथाओं की अपने तरीके से नई व्याख्या करने से बचना चाहिए।
धार्मिक मामलों को समाज पर ही छोड़े अदालत
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली 9 जजों की बेंच फिलहाल इस बात की बारीकी से समीक्षा कर रही है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत ‘आवश्यक धार्मिक प्रथाओंÓ के सिद्धांत क्या हैं और आस्था से जुड़े मामलों में अदालतें किस हद तक दखल दे सकती हैं। इस पर केंद्र ने हलफनामा देते हुए अदालत को सुझाव दिया है कि न्यायिक समीक्षा के दौरान हमेशा संवैधानिक सिद्धांतों का सम्मान किया जाना चाहिए। साथ ही, सदियों से चले आ रहे धार्मिक मानदंडों और परंपराओं को तय करने का अधिकार संबंधित समुदाय के विवेक पर ही छोड़ देना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *