मनवर लाल भारती।
पूर्व प्रधानाचार्य।
वर्तमान समय में राष्ट्र की सामाजिक गतिविधियों में धार्मिक परिदृश्य को देखकर धर्म के प्रति जिस प्रकार से सभी धर्मों में एक-दूसरे धर्म के प्रति नफरत की ज्वाला से एक-दूसरे को निशाना बनाया जा रहा है, इससे ऐसा लगता है कि हम अभी तक धर्म की वास्तविक परिभाषा को समझ ही नहीं पाए हैं। धर्म की शाब्दिक परिभाषा क्या है, यह वर्तमान धर्माचार्य ये भूल चुके हैं कि इस देश में स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, देश के जाने-माने क्रांतिकारी देश भक्त, साहित्यकार और गांधी एवं डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर जी ने जिस तरह से सर्व धर्म समभाव का सपना देखा था और भारतीय संविधान में धर्म को किस तरह से परिभाषित किया गया था ये सब कुछ भूल चुके हैं। हमें ऐसे लगता है कि अब वह भारत दिखाई ही नहीं दे रहा है। यहां ये लोग यह भी भूल चुके हैं कि संतों की वाणी में कबीर और नानक ने इस मायावी संसार को समझने का जो मार्ग बतलाया था उस मार्ग पर हमें किस तरह से चलना चाहिये, परन्तु इस विषय से इनका कोई लेना-देना नहीं है बल्कि ये धर्म के ठेकेदार देश की नई पीढ़ी की नस्ल को और अधिक भ्रमित कर एक-दूसरे के रक्त का प्यासा बनाते जा रहे हैं, जो पूरे राष्ट्र समाज में असहिष्णुता और अस्थिरता का जहर फैला चुके हैं। इस जहर से अब हमारी राष्ट्रीयता की अस्मिता पर सवालिया निशान लग चुके हैं। इसका आंकलन करना जरूरी था, पर संभवत: देश के राजनेता भी अब अपना मन इसी ओर पूर्ण रूप से ढाल चुके हैं।
जब-जब देश का बौद्धिक वर्ग मौन हुआ है और धर्म के ठेकेदार सक्रिय हुए हैं देश को तब कई प्रकार की विपत्तियों का सामना करना पड़ा है। देश का धर्म के इस मायावी जाल में फंसे रहना कई प्रकार के संकटों को पैदा करने जैसा है। यद्यपि यह संकट भारत की भू-धरा पर सदियों से अपना विकराल रूप दिखाते आया है, परन्तु जिस तरह से वर्तमान में धर्म के ठेकेदार अपनी मनमानी से कार्य कर रहे हैं और खुली चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं इस पर सरकार मूकबधिर बनकर तमाशाबीन की तरह अपना चरित्र दर्शा रही है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि हम और हमारा समाज इस भौतिकवादी दौड़ में बहुत पीछे है और धर्म की धर्मान्धता की दौड़ में सबसे आगे है। इसी को आज की नई पीढ़ी के बच्चे सत्य मानकर ईश्वर और खुदा के नाम पर अपनी जान तक देते हुए और यह कहते सुनाई देते हैं कि जिसने जन्म दिया है उसके लिए जान देना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है।
सम्पूर्ण राष्ट्र समाज सर्वोपरि की विचारधार हो रही खत्म
सम्पूर्ण राष्ट्र समाज सर्वोपरि है यह विचारधारा अब क्यों खत्म होती जा रही है और धर्म सर्वोपरि है यह अवधारणा क्यों बलवती होती जा रही है। यह स्थिति वर्तमान भारत के भविष्य पर एक बहुत बड़ा संकट जैसा है। हैरानी इस बात है कि सत्ताधारी लोग जनता की धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक लाभ लेकर अपना स्वार्थ साध रहे हैं और ऐसो आराम का जीवन जी रहे है और जनता को आपस में लड़ा कर संपूर्ण राष्ट्र समाज में असहिष्णुता वातावरण बनाने में व्यस्त हैं। ऐसी स्थिति देखकर हमें सत्यनारायण जी की पंक्तियां आज की इस स्थिति पर ठीक बैठती हैं कि:-
सड़क रास्ते जाम कराकर, जलवे अपने नाम करा कर।
सभी मसीहा लौट चुके हैं, शहर में कत्लेआम करा कर।।
भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में जब कोई संख्या बल को आधार कर धर्म का शक्तिशाली रुप में “जिसकी लाठी उसकी भैंस”की कहावत को चरितार्थ करते हुए चलते हैं तब ऐसी दशा उस समाज का पतन कर देता है और ऐसा ही देश की भोली भाली जनता की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ हो रहा है। आप अपने राष्ट्रवाद में ऐसा खेल खेलने वाले माहिर लोग अब खुलेआम सांप्रदायिक सद्भावना को ठेस पहुंचाते हुए देख जा सकते हैं। राष्ट्रीय हित में और संपूर्ण राष्ट्र समाज में धर्म की वास्तविक व्याख्या करना और राष्ट्र को ही राष्ट्र धर्म मानकर चलना असली धर्म की शिक्षा है, परन्तु वर्तमान समय में कुछ अलग ही घटित होना हैरान कर देता है। हम राष्ट्र के भीतर बौद्धिक वर्ग और साहित्यिक वर्ग को चुपचाप देख रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे कि इन्हें कोई तानाशाही कट्टरता सता रही हो।
युवा शक्ति की जान जरूरी या धर्म की कट्टरता
भारत में सांप्रदायिकता के धार्मिक अंतर द्वंद्व की अवधारणा ने हमेशा कई प्रकार की गुलामी को जन्म देकर समाज को अभी भी अपने शिकंजे में कसा हुआ है। हम धर्मांधता की अवधारणा में जड़े हुए अपने आप को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं। यही हमारा सबसे बड़ा दोष है। हम अभी एंजेल चकमा त्रिपुरा की एक बालक की निर्ममता पूर्ण हत्या के रूप में देखते हैं, जिसे चिड़ा-चिड़ा करके मारा गया है। ऐसी घटनाएं देखने से प्रतीत होता है कि इस समय भारत में दो तरह से युवा शक्ति स्वयं से जूझ रही है, एक प्रचंड बौद्धिक प्रतिभा वाले युवा हैं जो रोजगार की तलाश में अपने भविष्य की चिंता में डूबे हुए हैं और दूसरे जीवन की अच्छी शिक्षा न लेने के कारण धर्म का झण्डा लेकर आक्रोश में हैं। अब बौद्धिक वर्ग और साहित्यिक वर्ग को फैसला लेना है कि युवा शक्ति की जान जरूरी या धर्म की कट्टरता जरूरी।