प्याज व लहसुन अनुसंधान पर राष्ट्रीय कार्यशाला का हवालबाग में शुभारंभ

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– देशभर से जुटे वैज्ञानिक, तीन दिवसीय कार्यक्रम में होगी गहन चर्चा
अल्मोड़ा। भाकृअनुप- विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, हवालबाग, अल्मोड़ा में मंगलवार को प्याज एवं लहसुन पर अखिल भारतीय नेटवर्क अनुसंधान परियोजना की 16वीं वार्षिक कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। कार्यशाला का उद्घाटन मुख्य अतिथि, भारत सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री अजय टम्टा ने किया। उन्होंने संस्थान की उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्था ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पर्वतीय कृषि अनुसंधान को नई दिशा दे रही है। उन्होंने कहा कि प्याज और लहसुन ऐसी फसलें हैं जिनसे किसान अच्छा लाभ कमा सकते हैं, विशेषकर तब जब वे अपने उत्पादों को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाएं। कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे भाकृअनुप, नई दिल्ली के उपमहानिदेशक (बागवानी विज्ञान) संजय कुमार सिंह ने कहा कि यह कार्यक्रम अगले तीन वर्षों की कार्य योजना निर्धारित करेगा, जिसमें किसानों को तकनीकी रूप से मजबूत करने की रणनीति पर चर्चा होगी। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में बेमौसमी और विशेष किस्म की सब्जी उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। संस्थान के निदेशक लक्ष्मीकांत ने बताया कि संस्थान ने देश की पहली प्याज की संकर किस्म वीएल प्याज 67 का विकास किया था। अब तक प्याज की दो और लहसुन की दो किस्में विकसित, विमोचित और अधिसूचित की जा चुकी हैं। कार्यशाला के दौरान पुणे स्थित प्याज एवं लहसुन अनुसंधान निदेशालय के निदेशक विजय महाजन ने परियोजना की वार्षिक प्रगति पर प्रकाश डाला और ऑनलाइन मॉनिटरिंग व रिपोर्टिंग की जानकारी दी। इस अवसर पर संस्थान के तीन प्रकाशनों का विमोचन भी किया गया। साथ ही ‘गाइडलाइंस फॉर आइडेंटिफिकेशन ऑफ ऑनियन एंड गार्लिक वैरायटी/हाइब्रिड्स एवाल्यूएटेड अंडर एआईएनपीओआरजी फॉर रिलीज’ पुस्तिका का भी विमोचन हुआ। इस अवसर पर प्रगतिशील कृषक हुकुम सिंह और नैन सिंह को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में अल्मोड़ा नगर के महापौर अजय वर्मा, भाकृअनुप नई दिल्ली के सहायक महानिदेशक डॉ. सुधाकर पांडे, डॉ. के.ई. लवांडे, डॉ. बी.एस. के.के.वी., डॉ. प्रवीण मलिक (सीईओ, एग्रीइनोवेट), डॉ. संजय कुमार, डॉ. बी.एस. पाल, डॉ. विक्रमादित्य पांडे, डॉ. बी.एस. तोमर, डॉ. पी.के. गुप्ता सहित देशभर के कृषि विश्वविद्यालयों और संस्थानों के 70 से अधिक वैज्ञानिक मौजूद रहे।

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