चमोली(। कर्णप्रयाग। राजकीय औद्योगिक विकास एवं सांस्कृतिक मेले गौचर में पहाड़ी टोपी की मांग चरम पर है। ऊन से बनी पारंपरिक गढ़वाली टोपी को लोग दिल्ली, देहरादून, मेरठ व नोएडा जैसे शहरों में समौंण के रूप में भेज रहे हैं। यह टोपी न केवल गरिमा का प्रतीक है, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक पहचान भी है। इतिहास के अनुसार इसकी शुरुआत नौवीं शताब्दी में चांदपुरगढ़ी के राजा भानुप्रताप के काल में हुई थी। मेले में जोशीमठ, गोपेश्वर, मलारी जैसे क्षेत्रों के कारीगरों द्वारा तैयार ऊनी वस्त्र, कालीन और टोपियाँ बिक्री के लिए लाई गई हैं। रंगकर्मी कांति प्रसाद डिमरी ने कहा कि कलाकारों के लिए यह टोपी गर्व का प्रतीक है। इस बार मेले में प्रीतम भरतवाण, गजेंद्र राणा, सौरभ मैठाणी सहित कई लोक कलाकार पहाड़ी टोपी पहनकर मंच पर प्रस्तुति देंगे, जिससे मेले की सांस्कृतिक गरिमा और भी बढ़ेगी।