मैदानों में बढ़ती, पहाड़ों में घटती आबादी से असंतुलन: रावत

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देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में सोमवार हिमालयी विकास या हिमालयी आपदा? विषय मंथन हुआ। इसमें पर्यावरण प्रेमियों, लेखकों ने प्रतिभाग किया। सामाजिक चिंतक और लेखक विद्या भूषण रावत ने स्लाइड चित्रों के माध्यम से हिमालय की संवेदनशीलता, यहां हो रहे अनियंत्रित विकास को रेखांकित किया। उन्होंने एक दशक में केदारनाथ, रैणी-तपोवन, जोशीमठ जैसी आपदाओं पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड न केवल अपने भूगोल, बल्कि अपनी पहचान से जुड़े गंभीर संकट से भी जूझ रहा है। उन्होंने बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य, अनियंत्रित पर्यटन, वन क्षेत्रों में रिसॉर्ट, होटलों को पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। उन्होंने कहा कि तराई और मैदानी इलाकों में बेतहाशा आबादी बढ़ने, हिमालयी क्षेत्रों में आबादी कम होने से असंतुलन पैदा हो रहा है। मौके पर दयानंद अरोड़ा, प्रवीन कुमार भट्ट, जितेंद्र भारती, बिजू नेगी, प्रो. राजेश पाल, सुरेंद्र एस सजवान, चंद्रशेखर तिवारी, निकोलस, सुंदर सिंह बिष्ट आदि मौजूद थे।

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