सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के 732 हेक्टेयर क्षेत्र को निरस्त करने वाली अधिसूचना पर रोक लगा दी

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नई दिल्ली, सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को राजस्थान सरकार द्वारा राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के 732 हेक्टेयर क्षेत्र को गैर-अधिसूचित करने वाली अधिसूचना पर रोक लगा दी. कोर्ट ने कहा कि वह संरक्षित प्रजातियों के लिए आरक्षित किसी भी भूमि को गैर-अधिसूचित करने की अनुमति नहीं देगा और खनन माफिया को डकैत करार दिया.
कोर्ट ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया था. मामला राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन और लुप्तप्राय जलीय वन्यजीवों के लिए खतरा से जुड़ा है. राजस्थान में अवैध रेत खनन का जिक्र करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, आप अवैध खनन को बढ़ावा दे रहे हैं.
सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा, राजस्थान सरकार द्वारा 23 दिसंबर, 2025 को जारी और 9 मार्च, 2026 को अधिसूचित अधिसूचना पर रोक लगी रहेगी.सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने अवैध रेत खनन को बढ़ावा देने के लिए राजस्थान सरकार की कड़ी आलोचना की और कहा कि पारंपरिक डकैती की जगह खनन माफिया ने ले ली है. पीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने हार मान ली है और राजस्थान में खनन माफिया द्वारा उप-विभागीय मजिस्ट्रेटों (एसडीएम) और पुलिसकर्मियों सहित कई सरकारी अधिकारियों की हत्या कर दी गई है.
पीठ ने कहा कि 732 हेक्टेयर क्षेत्र को अधिसूचना से हटाना एक गंभीर मुद्दा है. राजस्थान सरकार के वकील से कोर्ट ने कहा कि राज्य की अधिसूचना आवश्यक वैधानिक मानदंडों पर खरी नहीं उतरी है.पीठ ने राजस्थान के वकील से कहा, वे (राज्य) इसे अपने आप नहीं कर सकते थेय यह अवैध है.
पीठ ने स्पष्ट किया कि वह संरक्षित प्रजातियों के लिए आरक्षित किसी भी भूमि को अधिसूचना से हटाने की अनुमति नहीं देगी. पीठ ने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है. क्या आपने वह स्थान देखा है ? क्या आप वहां गए हैं ? जाकर देखिए कि वह कितना नाजुक है. घड़ियाल अब लगभग विलुप्त होने की कगार पर हैं. केवल घड़ियाल ही नहीं, कई जलीय जीव भी.
मामले में एमिकस क्यूरी ने इसी मुद्दे पर 2022 से राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के समक्ष लंबित एक अलग कार्यवाही का हवाला दिया और कहा कि राजस्थान ने आज तक कोई पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ईएसजेड) परिभाषित नहीं किया है.पीठ को बताया गया कि राजस्थान ने पिछले साल दिसंबर में 732 हेक्टेयर क्षेत्र को गैर-अधिसूचित करने की अधिसूचना जारी की थी. पीठ ने पूछा कि इससे संरक्षण कार्यक्रम पर सीधा असर कैसे पड़ता है ? एमिकस वकील ने कहा कि एक बार गैर-अधिसूचित होने के बाद, यह राजस्व भूमि बन जाती है.पीठ ने कहा, वे इसे पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र घोषित नहीं करते हैं. हमने इसे रणथंबोर में देखा है. हमने इसे सरिस्का में देखा है.
पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, समस्या यह है कि राज्य सरकार निवारक नजरबंदी नामक कानून को पूरी तरह से भूल चुकी है. जैसलमेर में भी ऐसा ही हुआ था, जहां इन माफियाओं ने सभी पवनचक्कियों को नष्ट कर दिया था. पूरी व्यवस्था ध्वस्त होने की कगार पर थी.
पीठ ने कहा कि यदि राज्य कहता है कि वह अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा नहीं कर सकता, तो यह पूर्णत: अराजकता है. अमिकस ने कहा कि इन राज्यों को अदालत में दायर अपनी रिपोर्ट में उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों का जवाब देना चाहिए.
पीठ ने ध्यान दिया कि केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) ने भी इस मुद्दे पर उसके समक्ष एक रिपोर्ट दायर की है और तीनों राज्यों को अमिकस और सीईसी द्वारा दायर रिपोर्टों पर चार सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा है.पीठ ने कहा कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से पेश वकील निर्देश लेकर चार सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करेंगे. पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 11 मई को निर्धारित की है और यह भी निर्देश दिया है कि एनजीटी के समक्ष लंबित मामले को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया जाए.

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