नई दिल्ली , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि परिवार के भीतर मजबूत संवाद के जरिए लव जिहाद जैसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है। उनका कहना था कि जब घर में खुलकर और नियमित बातचीत होती है, तो ऐसी समस्याएं अपने आप कम होने लगती हैं। भोपाल के शिवनेरी भवन में आयोजित ‘स्त्री शक्ति संवादÓ कार्यक्रम में उन्होंने यह विचार रखे।
मोहन भागवत ने कहा कि समाज को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि किसी परिवार की बेटी किसी बाहरी व्यक्ति के बहकावे में कैसे आ जाती है। उनके अनुसार, परिवार के सदस्यों के बीच संवाद की कमी और आपसी दूरी इस तरह की स्थितियों को जन्म देती है। उन्होंने कहा कि जब घर में निरंतर बातचीत का माहौल होता है, तो धर्म, संस्कृति और परंपराओं के प्रति सम्मान स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।
संघ प्रमुख ने ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तीन अहम बिंदुओं पर जोर दिया। पहला, परिवार के भीतर निरंतर और सकारात्मक संवाद। दूसरा, लड़कियों में सजगता, आत्मविश्वास और आत्मरक्षा की भावना का विकास। तीसरा, इस तरह के अपराधों में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त और प्रभावी कार्रवाई। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक संगठनों और पूरे समाज को सजग रहकर सामूहिक रूप से विरोध दर्ज कराना होगा, तभी इसका स्थायी समाधान संभव है।
महिलाओं की भूमिका पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान महिलाओं की स्थिति से होती है। उनके अनुसार, भारतीय संस्कृति, धर्म और सामाजिक व्यवस्था महिलाओं के योगदान से ही सुरक्षित और सुदृढ़ बनी हुई है। उन्होंने कहा कि वह दौर अब पीछे छूट चुका है जब महिलाओं को केवल सुरक्षा के नाम पर घर तक सीमित रखा जाता था। आज पुरुष और महिलाएं मिलकर परिवार और समाज को आगे बढ़ा रहे हैं, इसलिए दोनों का जागरण जरूरी है।
उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण, अवसरों की समानता और वैचारिक चेतना को समय की मांग बताया। भागवत ने कहा कि यह प्रक्रिया पहले से चल रही है और महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन इसे और मजबूत किए जाने की आवश्यकता है। लिंग भेदभाव और उत्पीड़न के संदर्भ में उन्होंने कहा कि जहां पश्चिमी समाज में विवाह के बाद महिला की पहचान तय होती थी, वहीं भारतीय परंपरा में मातृत्व के माध्यम से महिला को उच्च स्थान दिया गया है। उनके अनुसार, मातृत्व भारतीय मूल्यों का केंद्रीय तत्व है।
संघ प्रमुख ने आधुनिकता के नाम पर अंधे पश्चिमीकरण की प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बचपन से बच्चों को कौन से संस्कार और मूल्य दिए जा रहे हैं, इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए सक्षम बनाना जरूरी है, क्योंकि भारतीय परंपराएं उन्हें सीमित नहीं करतीं, बल्कि सशक्त और विशिष्ट बनाती हैं। रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय महिलाओं ने हर युग में साहस और शक्ति का परिचय दिया है।
मोहन भागवत ने कहा कि आज पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है और देश इस भूमिका के लिए स्वयं को तैयार कर रहा है। देश की लगभग आधी आबादी महिलाएं हैं और बड़ी संख्या में महिलाएं समाज और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं, हालांकि अभी भी कई महिलाएं इस प्रक्रिया से नहीं जुड़ पाई हैं।
उन्होंने कहा कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है और उन्हें सुरक्षित स्थान मिलता है, वहां समाज स्वाभाविक रूप से संतुलित और स्वस्थ रहता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आज समाज सांस्कृतिक आक्रमण जैसी नई चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिन्हें सांस्कृतिक मार्क्सवाद और वोकिज्म जैसे नाम दिए जाते हैं। इनसे निपटने के लिए अपने धर्म, मूल्यों और परंपराओं को गहराई से समझना और आत्मसात करना जरूरी है।