शहर में बढ़ रहा बंदर व कुत्तों का आंतक

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वार्डों में घूम रहे बंदर व कुत्तों से बना खौफ
जयन्त प्रतिनिधि।
कोटद्वार : चार माह पूर्व नगर निगम ने प्रत्येक वार्ड में पिंजरे लगाकर बंदरों को पकड़ा और उन्हें दूर जंगल में छोड़ दिया था। लेकिन, वर्तमान में बंदरों की टोली दोबारा आबादी क्षेत्र में पहुंच चुकी है। नतीजा, पहले से ही कुत्तों के आतंक से भयभीत लोगों पर अब बंदर भी हमला करने लगे हैं। बेस अस्पताल में प्रतिदिन कुत्ते व बंदरों के काटने से घायल लोग पहुंच रहे हैं। लगातार बढ़ रही समस्या के बाद भी नगर निगम लापरवाह बना हुआ है। सबसे अधिक खतरा बच्चों को बुजुर्गों को बना हुआ है।
कोटद्वार नगर निगम क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसा वार्ड हो जहां उत्पाती बंदर व आवारा कुत्ते न दिखाई दें। सुबह से ही बंदर घरों में उत्पात मचाना शुरू कर देते हैं। बंदरों के कारण वार्डवासियों का अपने घरों की छत पर कपड़े व अनाज सुखाना भी मुश्किल हो गया है। वहीं, गलियों में घूम रहे आवारा कुत्ते भी चुनौती बन रहे हैं। गलियों में घूम रहा आवारा कुत्तों का झुंड राह चलते लोगों के लिए मुसीबत बन रहे हैं। आंकड़ों की बात करें तो बेस अस्पताल में प्रतिदिन पंद्रह से बीस लोग रेबीज इंजेक्शन लगवाने के लिए पहुंच रहे हैं। दो दिन पूर्व मानपुर क्षेत्र में घर की छत पर कपड़े सुखाने के लिए पहुंची एक महिला पर बंदर ने हमला कर दिया था। महिला ने निजी अस्पताल में पहुंचकर इंजेक्शन लगवाए। क्षेत्रवासी राहुल कुमार, राजीव सिंह ने बताया कि पूर्व में लगातार बढ़ती समस्या के बाद नगर निगम ने पिंजरे लगाकर बंदरों को रेस्क्यू किया था। लेकिन, वर्तमान में बंदर दोबारा से आबादी में पहुंच चुके हैं। बंदर खेतों में लगी फसल को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। अभिभावकों का अपने बच्चों को स्कूल भेजने व लेने के लिए साथ में जाना पड़ रहा है। दरवाजे खुले होने पर बंदरों का झुंड घर के अंदर पहुंच जाता है। नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत कालाबड़, शिवपुर, मानपुर, काशीरामपुर, सनेह, ग्रास्टनगंज, दुर्गापुरी सहित भाबर क्षेत्र के कई वार्डों में लगातार कुत्तों व बंदरों का आतंक बढ़ता जा रहा है। कुछ माह पूर्व गोविंदनगर में बंदरों के हमले से बचने के दौरान एक व्यक्ति छत की सीढ़ियों से नीचे गिर गया था। जिसे बेस अस्पताल में भर्ती करवाया गया।
बॉक्स समाचार
इसलिए खूंखार हो रहे बंदर
ठंड के अंत में जंगलों में फल-फूल कम हो जाते हैं, जिससे बंदर खाने की तलाश में आबादी की ओर अपना रूख करते हैं। ऐसे में खेतों में घुसने पर जब उन्हें भगाया जाता है तो वह आक्रामक हो जाते हैं। वहीं, पूर्व में बंदर घरों की छतों में लगी टंकी का ढक्कन खोलकर या उसे तोड़कर पानी पीते थे। लेकिन, वर्तमान में लोगों ने टंकियों पर लोहे के ढक्कन लगा दिए हैं। ऐसे में बंदर खाने के साथ पानी की तलाश में भी भटक रहे हैं। जिससे वह लोगों पर भी हमला कर देते हैं।

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