न्यायपालिका ने जनता के अभिभावक की भूमिका निभाई: प्रो. सेमवाल

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कोविड महामारी में न्यायपालिका ने लोगों को राहत देने को सरकार को किया मजबूर
जयन्त प्रतिनिधि।
श्रीनगर।
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग की ओर से भारत में कानून बनाने में न्यायपालिका और विधायिका की भूमिका: तथ्य, संघर्ष और समाधान विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। इस मौके पर विभाग के अध्यक्ष प्रो. एमएम सेमवाल ने कहा कि भारतीय शासन व्यवस्था में शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत अपनाया गया है। जिसमें सरकार के तीनों अंगों को अलग-अलग भूमिका, शक्तियां तथा दायित्व प्रदत्त हैं, किंतु वर्तमान समय में हम देखते हैं कि प्राय: विधायिका द्वारा न्यायापालिका पर उसके अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण का आरोप लगाया जाता है। न्यायपालिका की सक्रियता ने सरकार को जिम्मेदारी तय करने में मदद की है। और इस स्थिति में न्यायपालिका ने जनता के अभिभावक की भूमिका निभाई है।
विभाग की वरिष्ठ प्रो. हिमांशु बौड़ाई ने कहा कि सरकार की निष्क्रियता ने न्यायपालिका की सक्रियता को बढ़ावा दिया है। हालिया कोविड महामारी में देश में न्यायपालिका ने ही सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठाए और लोगों को राहत देने के लिए सरकार को मजबूर किया। शोध छात्रा मनस्वी सेमवाल ने कहा कि विधायिका एक स्वन्त्रत एवं विद्वतापूर्ण अंग है जिसके पास विधि निर्माण की शक्ति निहित है जबकि न्यायपालिका को सिर्फ अलार्म बेल की तरह व्यवहार करना चाहिए ना कि विधायिका के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करना चाहिए। शोध छात्र देवेंद्र सिंह ने कहा कि कानून निर्माण का कार्य संविधान द्वारा संसद (लोकसभा+ राज्यसभा+ राष्ट्रपति) को सौंपा गया है किंतु न्यायपालिका की भी इसमें अहम भूमिका है। शोध छात्रा शिवानी पांडेय ने कहा कि सरकार की निष्क्रियता ने न्यायपालिका के लिए राह खोली है। जब-जब सरकार कमजोर हुई है न्यायपालिका को सक्रिय होने का मौका मिलता है। पीजी छात्र शेखर नेगी, अखिलेश सिंह, शोध छात्रा कोमल पाल ने भी विचार रखे। संचालन शोध छात्र गौरव डिमरी ने किया।

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