गंगा किनारे कब्जा करने वालों की अब खैर नहीं, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मची खलबली; केंद्र से मांगा पूरा हिसाब

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नई दिल्ली , पवित्र गंगा नदी के किनारों और उसके मैदानी इलाकों (फ्लड प्लेन) पर अवैध रूप से पक्के निर्माण कर कब्जा जमाने वालों पर अब सुप्रीम कोर्ट की गाज गिरने वाली है। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार को एक कड़ा निर्देश जारी किया है। अदालत ने सरकार से गंगा किनारे हुए सभी अवैध निर्माणों और अतिक्रमण को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी बताने को कहा है कि इस अवैध कब्जे को हटाने और नदी के संरक्षण के लिए अब तक जमीन पर क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। इस आदेश के बाद से संबंधित विभागों और अतिक्रमणकारियों में हड़कंप मच गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- अतिक्रमण हटाने में क्या है बाधा?
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस गंभीर मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से कई तीखे सवाल किए। अदालत ने पूछा कि गंगा के पुनरुद्धार और प्रबंधन से जुड़ी अधिसूचना को प्रभावी ढंग से लागू करने में अथॉरिटी के रास्ते में आखिर क्या रुकावटें आ रही हैं। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिन-जिन राज्यों से होकर गंगा नदी बहती है, वहां की अथॉरिटी नदी की सुरक्षा के लिए क्या योजना बना रही है और यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि गंगा के किनारे हर तरह के अतिक्रमण से पूरी तरह मुक्त हों। अदालत ने माना है कि यह कोई छोटा मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके लिए एक व्यापक और गहन जांच की सख्त जरूरत है।
डॉल्फिन के अस्तित्व पर भी मंडरा रहा भारी खतरा
सुनवाई के दौरान अदालत में एक और बेहद चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील आकाश वशिष्ठ ने पीठ को बताया कि नदी के किनारों पर जिस बड़े पैमाने पर अवैध अतिक्रमण हो रहा है, उससे जलीय जीवों पर भी भारी संकट आ गया है। उन्होंने अदालत के संज्ञान में लाया कि गंगा नदी के इन हिस्सों में बड़ी संख्या में ताजे पानी की दुर्लभ डॉल्फिन पाई जाती हैं, जिनके प्राकृतिक आवास अब खतरे में हैं। इसलिए इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल ध्यान देने और सख्त कार्रवाई करने की आवश्यकता है।
एनजीटी के आदेश को दी गई थी चुनौती, 23 अप्रैल को अगला फैसला
इस पूरे मामले की शुरुआत पटना के रहने वाले अशोक कुमार सिन्हा द्वारा दायर एक याचिका से हुई है। दरअसल, साल 2020 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील बाढ़ के मैदानों पर अवैध निर्माण के खिलाफ दायर उनकी याचिका को खारिज कर दिया था। इसी फैसले को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सर्वोच्च अदालत ने अब गंगा बेसिन वाले कई राज्यों को नोटिस जारी कर दिया है और केंद्र से यह भी पूछा है कि अतिक्रमण हटाने के लिए उन्हें अदालत से किस तरह के विशेष निर्देशों की जरूरत है। इस पूरे मामले की अगली और बेहद अहम सुनवाई अब 23 अप्रैल को होगी, जिस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।

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