कामना सागर में हजारों श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी

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रुद्रपुर। हरिचांद गुरुचांद मतुआ मिशन के संस्थापक हरिचांद ठाकुर के 215वें जन्मोत्सव पर आयोजित तीन दिवसीय मतुआ मेले के दूसरे दिन देश के विभिन्न राज्यों के साथ ही पड़ोसी राष्ट्र नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। मधुकृष्ण त्रयोदशी महायोग के अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं ने कामना सागर में आस्था की डुबकी लगाकर अपने आराध्य का नमन किया। मंदिर परिसर में आचार्य विवेकानंद महाराज ने सामूहिक दीक्षा देकर हजारों लोगों को मतुआ संप्रदाय में शामिल कराया। सुबह मतुआ अनुयायियों ने ढोल-नगाड़ों के साथ हरिचांद ठाकुर के चित्र और आचार्य विवेकानंद ब्रह्मचारी को रथ में विराजमान कर नगर में भव्य शोभायात्रा निकाली। हरि मंदिर प्रांगण से शुरू हुई यह शोभायात्रा विभिन्न मार्गों से होते हुए पुनः मंदिर पहुंचकर संपन्न हुई। शोभायात्रा में शामिल श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों और शंख ध्वनि के बीच ‘जय हरिबोल’ के उद्घोष करते रहे। आचार्य विवेकानंद महाराज ने बांग्लादेश के ओढ़ाकांदी धाम के मुख्य सरोवर, सात समुद्रों और देश की प्रमुख तेरह नदियों से लाए गए जल को कामना सागर में मिलाकर उसे पवित्र किया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने फलदान भी किया। स्नान कार्यक्रम सुबह 8:09 बजे से देर शाम तक चलता रहा। दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और नेपाल से भी श्रद्धालु पहुंचे। मंदिर परिसर में देशभर से आई टीमों द्वारा अखंड हरिनाम संकीर्तन और लंगर का आयोजन निरंतर जारी रहा। कार्यक्रम में रुद्रपुर विधायक शिव अरोरा, पूर्व विधायक प्रेमानंद महाजन, चेयरमैन मनजीत कौर, भाजपा प्रदेश मंत्री गुंजन सुखीजा, पूर्व चेयरमैन सीमा सरकार, कांग्रेस प्रदेश महामंत्री ममता हालदार, ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि प्रीत ग्रोवर, भाजपा जिला उपाध्यक्ष अमित नारंग, युवा कांग्रेस प्रदेश महासचिव किशोर हालदार सहित कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।दलितों और शोषितों के उत्थान के लिए समर्पित रहे हरिचांद ठाकुरदिनेशपुर। महावारुणी स्नान मतुआ संप्रदाय का प्रमुख पर्व है। वर्ष 1812 में पूर्वी बंगाल के ओढ़ाकांदी गांव में हरिचांद ठाकुर का जन्म हुआ था। उन्होंने दलितों और शोषितों के उत्थान के लिए मतुआ मिशन की स्थापना की। उनके निधन के बाद वर्ष 1880 से ओढ़ाकांदी में महावारुणी स्नान की परंपरा शुरू हुई। हरिचांद ठाकुर ने जीवनभर शोषित, पीड़ित और वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनके प्रभाव से एक अंग्रेज अधिकारी ने ईसाई धर्म त्यागकर उनके अनुयायी बनते हुए ब्रिटिश संसद में दलितों पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाया। हरिचांद ठाकुर के प्रयासों से दलितों को ‘चंडाल’ संबोधन से मुक्ति मिली और उन्हें ‘नमशूद्र’ कहा जाने लगा। उनके बाद गुरुचांद ठाकुर ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। दिनेशपुर में वर्ष 1983 में आचार्य गोपाल महाराज द्वारा हरि मंदिर की स्थापना की गई, तभी से यहां महावारुणी स्नान आयोजित होता आ रहा है। मान्यता है कि मधुकृष्ण त्रयोदशी महायोग में कामना सागर में स्नान करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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