संसद से पारित ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पर संयुक्त राष्ट्र ने खेद जताया

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-कहा-बिना पर्याप्त परामर्श के जल्दबाजी में पारित किया गया
नईदिल्ली, पिछले दिनों संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा से पारित किए गए ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने चिंता जताई है। गुरुवार को यूएनएचआर ने एक बयान जारी कर कहा कि विधेयक को बिना किसी पर्याप्त परामर्श के जल्दबाजी में पारित कर दिया गया है, जिससे उनके अधिकार छिन जाने का खतरा है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि इस विधेयक का निजता के अधिकार पर दूरगामी असर पड़ेगा।
यूएनएचआर ने बयान में कहा, हमें खेद है कि ट्रांसजेंडर अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ा संशोधन विधेयक, 2026 बिना पर्याप्त परामर्श के जल्दबाजी में पारित किया गया। संशोधनों से ट्रांसजेंडर अधिकार छिनने का खतरा है, जो उन्होंने मुश्किल से पाए थे। ये संशोधन स्व-पहचान की जगह अनिवार्य चिकित्सा सत्यापन लागू करते हैं। भारत हमेशा ट्रांसजेंडरों और लैंगिक अधिकारों में अग्रणी रहा है। विधेयक से निजता अधिकार पर दूरगामी असर पड़ेगा और ट्रांसजेंडरों के हाशिये पर जाने का खतरा है।
वर्ष 2019 में ट्रांसजेंडर संरक्षण अधिनियम लागू हुआ था, जिसमें मार्च में सरकार ने संशोधन किए हैं। विधेयक पारित होने से ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा सीमित हुई है। अगर कोई व्यक्ति जन्म के समय निर्धारित लिंग से अलग कोई लिंग महसूस करता है तो वह इसमें शामिल नहीं होगा। जन्मजात ट्रांसजेंडर, जबरन ट्रांसजेंडर बनाए गए व्यक्ति इसमें शामिल होंगे। सर्जरी या हार्मोन परिवर्तन से बने ट्रांसजेंडर को मेडिकल बोर्ड से प्रमाणपत्र लेना होगा। इसमें जिलाधिकारी को कई अधिकार मिले हैं।
विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान, ट्रांसजेंडर प्रमाणपत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया और लिंग-पुष्टि देखभाल प्रक्रियाएं करने वाले चिकित्सा संस्थानों के लिए अनुपालन आवश्यकताओं से संबंधित संशोधन शामिल हैं, जिसको लेकर विरोध हो रहा है। इस विधेयक को पेश किए जाने के बाद देशभर के ट्रांसजेंडर समुदायों ने कड़ा विरोध-प्रदर्शन किया था। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी विरोध जता चुके हैं। सरकार की राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद के सामुदायिक प्रतिनिधि सदस्यों ने परामर्श न करने का आरोप लगाया है।

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