जयन्त प्रतिनिधि।
थलीसैंण : उपनल कर्मियों ने समान कार्य समान वेतन में भेदभाव का आरोप लगाया। कहा कि यदि सरकार शीघ्र इस विषय पर पुनर्विचार कर संशोधित शासनादेश जारी नहीं करती है, तो समस्त उपनल कर्मचारी 18 फरवरी को शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से प्रदेश स्तर पर एकत्र होकर उक्त शासनादेश के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करेंगे। यदि मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो कर्मचारी अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु माननीय उत्तराखंड उच्च न्यायालय की शरण लेने के लिए बाध्य होंगे।
उपनल कर्मी गौरव, अमित, विनोद, कन्हैया, अनिल ने कहा कि _03 फरवरी 2026_ को राज्य सरकार द्वारा जारी शासनादेश में वर्ष 2018 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को लाभ से वंचित रखा गया है। अनेक कर्मचारी ऐसे हैं जिन्होंने उपनल के माध्यम से 15-20 वर्षों तक निरंतर सेवा दी है, किंतु एक ही विभाग/पद पर 10 वर्ष पूर्ण न होने के आधार पर उन्हें शासनादेश के लाभ से वंचित कर दिया गया है। यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि उनकी कुल सेवा अवधि को नजर अंदाज किया जा रहा है। इस निर्णय से लगभग 12-13 हजार कर्मचारी प्रभावित हो रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या पूर्व सैनिकों एवं उनके आश्रितों की है। सभी कर्मचारी समान कार्य, समान दायित्व एवं समान जोखिम के साथ कार्य कर रहे हैं, अत: केवल नियुक्ति तिथि के आधार पर भेदभाव किया जाना न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता। जबकि सभी कर्मचारी समान कार्य, समान दायित्व और समान जोखिम के साथ कार्य कर रहे है। यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 16 (समान अवसर का अधिकार) की भावना के विपरीत प्रतीत होता है। उपनलकर्मियों ने कहा कि 2018 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को भी शासनादेश में शामिल किया जाए। कटऑफ तिथि हटाकर सभी उपनल कर्मचारियों को समान लाभ दिया जाए। कहा कि यदि मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो कर्मचारी अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु माननीय उत्तराखंड उच्च न्यायालय की शरण लेने के लिए बाध्य होंगे।