डिलीवरी बॉय की सामाजिक सुरक्षा के क्या हैं उपाय

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-सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार व कंपनियों से मांगा जवाब
नई दिल्ली, एजेंसी : ओला, ऊबर, स्विगी, जोमैटो जैसी कंपनियों के लिए डिलीवरी बॉय आदि के तौर पर काम करने वाले लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा के आखिर क्या उपाय हैं। यह सवाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और कंपनियों से पूछा है। ऑनलाइन फूड डिलीवरी और कैब कंपनियों के लिए काम करने वाले वर्कर्स को लेकर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और कंपनियों से जवाब मांगा है। जस्टिस एल. नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई की बेंच ने इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स की ओर अर्जी पर सुनवाई करते हुए जवाब मांगा है। इसके साथ ही जनवरी 2022 में अगली सुनवाई करने की बात कही है।
ऐसी ही अर्जी दो अन्य लोगों ओला ड्राइवर तुलसी जगदीश बाबू और कौशर खान की ओर से भी दायर की गई थी। इनकी मांग थी कि हम लोगों के लिए भी हेल्थ इंश्योरेंस, मैटरनिटी लीव, पेंशन, ओल्ड एज असिस्टेंट, दिव्यांगता अलाउंस और कंपनी के खर्च पर वैक्सीनेशन जैसी सुविधाएं होनी चाहिए। संगठन की ओर से पक्ष रख रहीं अधिवक्ता इंदिरा जय सिंह ने कहा कि इन लोगों को किसी भी नियम के तहत कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। भले ही संगठित रोजगार की बात हो या फिर असंगठित कर्मचारियों के लिए बने नियमों की बात हो, इनमें से किसी के भी तहत ऐसे लोगों को किसी सुविधा का प्रावधान नहीं है। इंदिरा जयसिंह ने कहा कि आज के दौर में यही लोग वर्कमैन हैं। उन्होंने कहा कि हम अपनी अर्जी में मांग करते हैं कि इन लोगों को असंगठित क्षेत्र का वर्कर घोषित किया जाए और तमाम सोशल बेनिफिट्स उन्हें दिए जाएं। अर्जी में मांग की गई है कि वर्कमेन्स कम्पेनसेशन ऐक्ट, इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स ऐक्ट और ईएसआईसी जैसे नियमों के तहत मिलने वाले लाभ इन्हें भी प्रदान किए जाएं। उन्होंने कहा कि सामाजिक सुरक्षा का अधिकार किसी के लिए भी जरूरी है, भले ही वह संगठित क्षेत्र में काम कर रहा हो या फिर असंगठित क्षेत्र का हिस्सा हो।

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