भारतीय न्यायिक प्रणाली का किया जाना चाहिए भारतीयकरण : जस्टिस एनवी रमना

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चेन्नई, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (सीजेआइ) एनवी रमना ने शनिवार को कहा देशवासियों की सुविधा के लिए भारतीय न्याय प्रणाली का भारतीयकरण किया जाना चाहिए। लोगों को भी अदालतों की प्रथाओं, प्रक्रियाओं के साथ मुकदमे किस दिशा में बढ़ रहे हैं इसके बारे में समझना-बूझना चाहिए। कानूनी प्रक्रिया शादी में मंत्रों के जाप जैसी जटिल नहीं होनी चाहिए, जिसे हम में से अधिकांश लोग नहीं समझते।
मद्रास हाई कोर्ट के नए प्रशासनिक ब्लाक के शिलान्यास समारोह में बोलते हुए रमना ने कहा कि भारतीय लोग संकट के समय न्यायपालिका की ओर इस दृढ़ विश्वास के साथ देखते हैं कि उनके अधिकारों की रक्षा अदालतों द्वारा की जाएगी। रमना ने कहा कि न्यायपालिका के कामकाज में सुधार करने और लोगों तक न्याय पहुंच आसान बनाने पर विचार करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि यही कारण है कि मैं न्याय प्रणाली के भारतीयकरण का एक प्रबल समर्थक रहा हूं। कानूनी प्रक्रिया आसान और समझ में आने वाली होनी चाहिए। प्रेट्र के अनुसार उन्होंने देश की अदालतों में स्थानीय भाषाओं के प्रयोग पर जोर देते हुए कहा कि देश के विभिन्न हाई कोर्ट में स्थानीय भाषाओं को प्रयोग में लाने में अभी कुछ रुकावटें हैं लेकिन विश्वास है कि वैज्ञानिक तौर-तरीकों और आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस से इन समस्यायों को निकट भविष्य में सुलझा लिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि तमिल लोग अपनी संस्ति की रक्षा करने और भाषाई अधिकारों को लेकर सबसे आगे रहे हैं। उन्होंने पिछली सदी के छठे दशक में हुए हिंदी विरोधी आंदोलन का भी उल्लेख किया। जस्टिस रमना ने हाई कोर्ट में स्थानीय भाषाओं के प्रयोग की बात तब की जब इस कार्यक्रम में भाग ले रहे राज्य के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने मद्रास हाई कोर्ट में कार्यवाही तमिल भाषा में कराए जाने की अनुमति देने की मांग की।
चीफ जस्टिस ने कहा कि समय समय पर देश के विभिन्न क्षेत्रों से इस तरह की मांग उठती रही है कि संविधान के अनुच्टेद 348 के तहत संबंधित हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा में कामकाज की अनुमति दी जाए। इस विषय पर बहुत बहस हो चुकी है। मुझे लगता है कि जल्द ही इसका निदान निकलेगा। उन्होंने कहा कि चीफ जस्टिस के रूप में अपने कार्यकाल के पिछले एक वर्ष के दौरान, मैं अपनी कानूनी प्रणाली को प्रभावित करने वाले विभिन्न मुद्दों को उजागर कर रहा हूं।
आजकल न्यायपालिका सहित सभी संस्थानों को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा मुद्दा जनता की नजरों में निरंतर विश्वास सुनिश्चित करना है। न्यायपालिका को कानून के शासन को बनाए रखने और विधायी और कार्यकारी ज्यादतियों की जांच करने की अत्यधिक संवैधानिक जिम्मेदारी मिली हुई है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने और लागू करने का हमारा कर्तव्य है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक भारी बोझ है लेकिन हमने शपथ लेने के दिन इसे खुशी से चुना है। यही कारण है कि न्यायिक संस्थानों को मजबूत करना मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

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