नेपाल की सियासत ने बॉर्डर पर रहने वालों की बढ़ाई टेंशन

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पिथौरागढ़। उत्तराखंड में नेपाल से भारत की 270 किलोमीटर की सीमा लगती है। पिथौरागढ़ के कालापानी से ऊधमसिंह नगर के मझोला तक बॉर्डर पर दोनों मुल्कों के लोग दशकों से भाइचारे के साथ रहते आए हैं। लेकिन बदले हुए हालात ने इन इलाकों में बसे लोगों की चिंता को बढ़ा दिया है। खासकर वे लोग ज्यादा टेंशन में हैं, जिनके रिश्ते-नाते और कारोबार दूसरे मुल्क में हैं। नेपाल की प्रतिनिधि सभा ने दो तिहाई बहुमत के साथ नए राजनीतिक नक्शे को सहमति दी है, जिसमें भारत के कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल का हिस्सा दर्शाया गया है।
नेपाल के इस कदम ने दोनों मुल्कों के राजनैतिक पारे को तो सातवें आसमान पर पहुंचाया ही है, साथ ही मानवीय रिश्तों के लिए भी दिक्कत पैदा कर दी है। बदले हालात में दोनों मुल्कों की सीमाओं पर रहने वाले भविष्य को लेकर खासे परेशान हैं। पिथौरागढ़ के झूलाघाट की गीता पंत ने अपनी बेटी की शादी दशकों पहले नेपाल के महेंद्रनगर में कर दी थी। तभी से उनका और उनकी बेटी का दोनों देशों से अटूट रिश्ता बना है। लेकिन अब गीता को चिंता सता रही है कि अगर हालात यूं ही खराब होते रहे तो, कहीं नेपाल-भारत के बीच खुले आवागमन में रोक न लग जाय। गीता की तरह नेपाल के दार्चुला जिले के जनक और शंकर भी परेशान हैं। जनक और शंकर भाई हैं जो एक दशक से भारत के धारचूला में दुकान चला रहे हैं। दुकान से होने वाली कमाई से ही उनका घर चलता है। अब इन दोनों भाईयों को ये डर सता रहा है कि कहीं उन्हें अपना कारोबार न समेटना पड़ जाय। वैसे भी लिपुलेख सड़क के उद्धघाटन के बाद नेपाल ने 270 किलोमीटर के इस इलाके में सुरक्षा काफी बड़ा दी है। फिलहाल तो लॉकडाउन के कारण दोनों मुल्कों के बीच आवाजाही बंद है। लेकिन अब यहां लोगों को ये डर भी सता रहा है कि कहीं कोरोना काल का ये लॉकडाउन हमेशा का लॉकडाउन न हो जाय। इस इलाके में भारत के 3 और नेपाल के 7 जिलों में सदियों से रोटी-बेटी के ताल्लुक हैं।

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