धरातल पर नहीं उतरी योजनाएं, पहचान को तरस रहा कण्वाश्रम

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राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी विकास की राह को तरस रहा कण्वाश्रम
जयन्त प्रतिनिधि।
कोटद्वार : राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी भाबर क्षेत्र में स्थित कण्वाश्रम विकास की राह को तरस रहा है। लगातार घोषणाओं के बाद भी आज तक धरातल पर कार्य प्रारंभ नहीं हो पाया है। जबकि, क्षेत्रवासी लगातार कण्वाश्रम के विकास का मुद्दा उठाते रहते हैं। लोकसभा हो या विधानसभा हर चुनाव में नेता कण्वाश्रम के विकास का सपना दिखाते हैं।
राजनैतिक मंचों से कई मर्तबा राष्ट्रीय धरोहर बनाने की घोषणा की गई, लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि जिस कण्वाश्रम ने देश को नाम दिया। आज उसका नाम लेने वाला कोई नहीं। उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ तो उम्मीद जगी कि कण्वाश्रम को पहचान मिलेगी, लेकिन कण्वाश्रम राष्ट्रीय धरोहर बनना तो दूर, उत्तराखंड में ही उपेक्षित पड़ा है। कण्वाश्रम एक समय में अध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान का विश्वविख्यात केंद्र था। जिसमें संपूर्ण विश्व के दस सहस्त्र विद्यार्थी कुलपति कण्व से शिक्षा ग्रहण करते थे। महर्षि कण्व, विश्वामित्र, दुर्वासा आदि की तपोस्थली के साथ ही यह स्थान मेनका-विश्वामित्र और शकुंतला व राजा दुष्यंत की प्रणय स्थली भी रहा है। यही वही स्थान है, जहां शकुंतला-दुष्यंत के तेजस्वी पुत्र भरत ने जन्म लिया। वहीं भरत जिनके नाम से देश का नाम भारत पड़ा। प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने वर्ष 1955 में रूस यात्रा की थी। उस दौरान रूसी कलाकारों ने महाकवि कालिदास रचित ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ की नृत्य नाटिका प्रस्तुत की। एक रूसी दर्शक ने पं. नेहरू से कण्वाश्रम के बारे में जानना चाहा, लेकिन उन्हें जानकारी न थी। वापस लौटते ही पं. नेहरू ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद को कण्वाश्रम की खोज का दायित्व सौंप दिया। 1956 में प्रधानमंत्री पं. नेहरू व उप्र के मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद के निर्देश पर तत्कालीन वन मंत्री जगमोहन स्ािंह नेगी कोटद्वार पहुंचे व कण्वाश्रम (चौकीघाटा) के निकट एक स्मारक का शिलान्यास किया, जो आज भी मौजूद है। मालिनी नदी के तट पर स्थित कण्वाश्रम के गौरवमयी इतिहास से देश ही नहीं, सूबे की सरकार भी शायद अनजान लगती है। ऐसा न होता तो आजादी के 78 साल बाद भी कण्वाश्रम गुमनामी के अंधेरे में न डूबा होता। राज्य गठन के बाद कण्वाश्रम को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित करने की घोषणाएं कई राजनैतिक मंचों से हुई। लेकिन, आज तक किसी घोषणा को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। कण्वाश्रम के विकास की योजनाएं मात्र शिलान्यास तक ही सिमटी रखेंगी अथवा कण्वाश्रम को नई पहचान मिल पाएगी।

केवल विकास के दावें
सम्राट भरत की जन्मस्थली कण्वाश्रम को राष्ट्रीय फलक पर लाने के लिए उत्तराखंड के सत्तासीनों ने भले ही तमाम दावे किए हो। लेकिन, कण्वाश्रम आज भी गुमनामी का दंश झेल रहा है। सरकार भले ही इस पावन स्थल की ओर से पूरी तरह निष्क्रिय हो। लेकिन, प्रकृति लगातार यह संकेत दे रही है कि इस पावन स्थल के गर्भ में एक समृद्ध सभ्यता का इतिहास दफन है। अस्सी के दशक में कण्वाश्रम क्षेत्र में बरसाती नाला ने भयंकर तबाही मचाई और जब नाले का प्रकोप शांत हुआ तो क्षेत्र में कई पुरानी मूर्तियां व स्तंभ मिले। इससे पहले कि प्रशासन को इस बात की भनक लगती, ग्रामीण कई मूर्तियों व स्तंभों को साथ लेकर चलते बने। बाद में प्रशासन ने मौके से मिली कुछ मूर्तियों व स्तंभों को कण्वाश्रम स्थित स्मारक में रख दिया। बताना जरूरी है पुरातत्व विभाग ने कण्वाश्रम में मिली मूर्तियों व स्तंभों को कत्यूरी काल का बताया है।

धरातल पर नहीं दिखा विकास
कण्वाश्रम को विश्व पटल पर पहचान दिलवाने के लिए नेताओं ने बड़ी-बड़ी घोषणाएं की। लेकिन, आज तक यह घोषणाएं धरातल पर रंग नहीं ला पाई। नतीजा, आज भी कण्वाश्रम विकास की राह को तरस रहा है। कुछ वर्ष पूर्व कण्वाश्रम में झील व स्मारक बनाने की कही गई। लेकिन, यह बात भी केवल हवाई साबित हुई। यदि कण्वाश्रम का बेहतर विकास होता है तो इससे क्षेत्र को नई पहचान मिलेगी। साथ ही स्थानीय युवाओं के लिए स्वरोजगार के भी द्वार खुलेंगे।

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