देश की जनता परिवारवादी दलों से मुंह मोड़ रही है

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नई दिल्ली, एजेंसी। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद जैसे ही इसके आसार उभरे कि कांग्र्रेस की शर्मनाक हार के लिए गांधी परिवार पर अंगुलियां उठेंगी, वैसे ही कई कांग्रेस नेता परिवार के बचाव में आ गए। इसी कारण सोनिया गांधी की ओर से नेतृत्व छोड़ने की पेशकश करते ही चाटुकार कांग्रेस नेताओं में उनमें आस्था जताने की होड़ मच गई। गांधी परिवार ने पांच राज्यों में हार की जिम्मेदारी लेने के बजाय जिस तरह इन राज्यों के कांग्रेस अध्यक्षों से त्यागपत्र मांग लिए, उससे यदि कुछ स्पष्ट हुआ तो यही कि परिवार पार्टी पर अपना कब्जा छोडने को तैयार नहीं। अभी यह कहना कठिन है कि कांग्रेस को संचालित करने के तौर-तरीकों से नाखुश जी-23 समूह के नेताओं ने जो दबाव बनाया हुआ है, वह कुछ रंग लाएगा या नहीं, लेकिन यदि कांग्रेस इसी तरह चलती रही तो उसका कोई भविष्य नहीं।इस समूह के नेताओं में केवल कपिल सिब्बल ही हैं, जिन्होंने पार्टी का नेतृत्व गांधी परिवार से इतर अन्य किसी को सौंपने की मांग की है। कांग्र्रेस की वर्तमान स्थिति देखकर लगता है कि सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी अभी भी उसी मनोदशा में हैं, जिसमें वे तब थे जब संप्रग सरकार सत्ता में थी।

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