-याचिकाकर्ताओं को दिल्ली हाई कोर्ट जाने की दी स्वतंत्रता, 20 और 21 अगस्त की सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने की मांग करने को कहा
नई दिल्ली,सुप्रीम कोर्ट ने 20 और 21 अगस्त को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे वकीलों से कथित मारपीट की घटना की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। हालांकि, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का रुख करने की स्वतंत्रता दे दी।
वकीलों ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्रा के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इसी दौरान कुछ प्रदर्शनकारी वकीलों के साथ कथित तौर पर मारपीट किए जाने का आरोप लगाया गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से मामले की सीबीआई जांच और 20 तथा 21 अगस्त की घटनाओं से संबंधित परिसर की निगरानी कैमरों की फुटेज तत्काल सुरक्षित रखने की मांग की गई थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष दलील दी कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने कथित तौर पर वकीलों के साथ मारपीट की। भूषण ने कहा कि आरोपित लोगों ने स्वयं को वकील बताया था।
उन्होंने मामले को जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की मांग करते हुए कहा कि वकीलों को भी अन्य नागरिकों की तरह शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। केवल इसलिए उनके इस अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता कि वे वकील हैं।
भूषण ने सीबीआई जांच कराने और घटनास्थल की निगरानी कैमरों की फुटेज तत्काल सुरक्षित रखने पर जोर दिया। उन्होंने आशंका जताई कि महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट किए जा सकते हैं।
प्रशांत भूषण ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष की ओर से जारी कथित बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदर्शन कर रहे वकीलों के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया और आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों ने रात में आकर प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट की।
भूषण ने अदालत से कहा कि उन्हें आशंका है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कार्यालय में लगे निगरानी कैमरों की फुटेज नष्ट की जा सकती है। इसलिए फुटेज को तत्काल सुरक्षित रखने का आदेश दिया जाना जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। पीठ ने कहा कि कथित घटना नई दिल्ली स्थित बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कार्यालय में हुई है, इसलिए याचिकाकर्ताओं को दिल्ली हाई कोर्ट का रुख करना चाहिए।
अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट इस मामले पर उचित तरीके से विचार कर सकता है। पीठ ने वकीलों के प्रदर्शन करने के अधिकार को स्वीकार करते हुए यह भी सवाल किया कि अपनी शिकायतों के समाधान के लिए उपलब्ध कानूनी माध्यमों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया से जुड़े कई मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी विचार कर चुका है। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित लोग अपनी शिकायत लेकर अदालत के समक्ष आते तो संभवत: उस पर अन्य मामलों के साथ सुनवाई की जा सकती थी।
प्रशांत भूषण ने दोहराया कि वकीलों के विरोध और प्रदर्शन के अधिकार को केवल उनके पेशे के आधार पर कम नहीं किया जा सकता। हालांकि, अदालत की टिप्पणी के बाद वह याचिका वापस लेकर दिल्ली हाई कोर्ट जाने के लिए सहमत हो गए।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने रजिस्ट्री को इस संबंध में उचित आदेश जारी करने का निर्देश दिया।
इससे पहले बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि भारत के महान्यायवादी और सॉलिसिटर जनरल, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रत्येक नीतिगत फैसले से सक्रिय रूप से जुड़े रहें। यह व्यवस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नए चुनाव होने और उसके पुनर्गठन तक जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष का पद पर बने रहना वर्ष 2030 तक चलने वाली स्थायी व्यवस्था के रूप में नहीं माना जा सकता।