अभिव्यक्ति की विकृत मानसिकता

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पार्थसारथि थपलियाल
करीब 25 साल पहले एक फीचर फिल्म आई थी द गैम्बलर, उसमें एक गीत था- मैं चाहे ये करूँ, मैं चाहे वो करूँ, मेरी मर्ज़ी…. तब यह गीत युवाओं का मस्तीभरा गीत हुआ करता था। इन 25 वर्षों में इस गीत को भारत में विभिन्न लोगों ने अपने-अपने अंदाज में लिया। सबसे से अधिक इसका उद्देश्य मार्केटिंग, एडवरटाइजिंग कंपनियों और अश्लीलता के माध्यम से धन कमाने वाले लोगों ने समझा। बाजारवाद इनके माध्यम से भारतीय संस्कृति को विद्रुपित कर रहा है। इसका समर्थन हमारे देश के वामी, कामी और चामी बुद्धिजीवी करते हैं।
जब स्वच्छंदता में बदल जाती है तो तब एक स्वच्छंद इंसान और पागल में कोई फर्क नही राह जाता है। उनका सूत्रवाक्य होता है-मेरी मर्जी। वाह साहब। कैसी-कैसी मर्जियाँ। हाल ही में कुछ कथावाचक ड्रामाबाजों भी उसी स्वच्छंदता का लाभ उठाया और पेट्रो डॉलर और रुपये खूब कमाए। जब सनातन धर्म के जागरूक लोगों ने थू-थू की तो उन्हें लगा कि उनकी नौटंकी खतरे में पड़ गई है। अब तीन लोगों का जिक्र करना इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 (1) का वीभत्स उल्लंघन किया है। इन तीनों के कुकृत्य पब्लिक डोमेन में हैं, इसलिए पब्लिक का अधिकार है कि संस्कृति के तार-तार होते देखना एक नागरिक के लिए भी शोभनीय नहीं है। उनमें से एक कुख्यात प्रोड्यूसर एकता कपूर है, जिसने भारतीय संस्कृति पर अनेक दाग लगाए। फिलहाल वह एक वेब सीरीज शुरू कर रही है। इस बार उसने यह दिखाया है कि बॉर्डर पर गए फौजियों की पत्नियां अपने घरों में किस प्रकार अनैतिक संबंध बनाती हैं। यह हमारे देश के बहादुर सैनिकों के पवित्र जीवन पर भयानक हमला है। कुत्तों की तरह भौंकने वाले वर्ग की तो जीभ ही कट गई, कि वे किस तरह से इस हरकत का विरोध करें। शायद हाथ भी टूट गए लिखकर भी अपना विरोध जाहिर नहीं कर सकते। बाजारू मीडिया और इनकी तो सांठ गांठ है।
एक कोई सुरलीन कौर है। उसने सभ्यता की सभी हदें तोड़ दी हैं, वह पोर्न संस्कृति को फैलाने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग जमकर कर रही है। ऐसे ही एक अदिति मित्तल है जो सनातन संस्कृति का भोंडा प्रदर्शन कर रही है। दोष उसका तो है लेकिन जिसने परवरिश की है वह अधिक जिम्मेदार है। हमारे देश मे अश्लीलता को रोकने के कई कानून हैं, लेकिन जिन्हें इनकी पालन करनी/करानी है वे मजे ले रहे हैं। आपको लगता होगा कि सरकार शायद एक्शन लेती होगी। बड़ी-बड़ी कंपनियां उन बड़े लोगों के कई उपकार कर देती हैं, फिर उन्हें क्या जरूरत। ये फेविकोल का जोड़ है। जनता कुछ जाग जाय तो संभव है। अन्यथा गटर के जिस भी ढक्कन को उठाओगे गंदगी के अलावा कुछ नहीं।

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