बाढ़ के बाद नई उम्मीद: असम के जुनाकीमंडल गांव में वैज्ञानिक पुनर्वास पहल

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देहरादून, असम में हाल ही में आई भीषण बाढ़ से प्रभावित गांवों में पुनर्वास और सुरक्षित आवास को लेकर वैज्ञानिक पहल शुरू की गई है। जोरहाट जिले के तिताबोर क्षेत्र स्थित जुनाकीमंडल गांव, जो उरकफ स्मार्ट विलेज मिशन के तहत चयनित गांवों में शामिल है, में उरकफ-उइफक की बहुविषयक टीम ने मैदानी स्तर पर पहुंचकर बाढ़ से हुए नुकसान का वैज्ञानिक आकलन किया।
बाढ़ के कारण गांव में कई आवासीय भवनों, ग्रामीण आधारभूत ढांचे और सामुदायिक सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है। इसके मद्देनजर टीम ने प्रभावित भवनों का विस्तृत सर्वेक्षण कर संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक क्षति का आकलन किया। साथ ही भवनों के कमजोर हिस्सों की पहचान कर उनकी मरम्मत, रेट्रोफिटिंग और सुदृढ़ीकरण के लिए आवश्यक तकनीकी उपाय सुझाए गए।
आवास सक्षम कार्यक्रम में 150 से अधिक लोगों ने लिया हिस्सा
जुनाकीमंडल गांव में आवास सक्षम: लाभार्थियों के लिए तकनीकी जागरूकता एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में 150 से अधिक लोगों ने भाग लिया। इसका उद्देश्य प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के लाभार्थियों को सुरक्षित, किफायती, टिकाऊ और आपदा-रोधी आवास निर्माण की तकनीकों से परिचित कराना था। बाढ़ और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को देखते हुए भवन मरम्मत एवं रेट्रोफिटिंग, प्लिंथ प्रोटेक्शन वॉल, नॉन-इरोडेड मड प्लास्टर, फायर-रिटार्डेंट थैच रूफ तथा बांस से निर्मित सुरक्षित और टिकाऊ आवास जैसी तकनीकों पर विशेष जोर दिया गया।
75 प्रतिशत तक ऊर्जा बचत वाली तकनीक का प्रदर्शन
कार्यक्रम में उरकफ-उइफक द्वारा विकसित विभिन्न तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। इनमें हाइब्रिड सोलर वॉटर हीटिंग एवं स्पेस कंडीशनिंग तकनीक प्रमुख रही।
विद्यालय और आंगनवाड़ी भवनों के लिए प्रस्तावित यह तकनीक गर्म पानी उपलब्ध कराने, मौसम के अनुसार भवन के अंदर तापीय आराम बनाए रखने तथा रसोई में स्वच्छ और किफायती ऊर्जा के उपयोग में मदद कर सकती है। उरकफ-उइफक के अनुसार यह प्रणाली पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में 75 प्रतिशत तक ऊर्जा खपत में बचत कर सकती है। इससे ग्रामीण और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में ग्रिड बिजली तथा पारंपरिक तापन प्रणालियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। यह तकनीक उरकफ-उइफक, रुड़की में स्वदेशी रूप से विकसित और सत्यापित की गई है तथा कल्पा, किन्नौर और कळइढ लेह-लद्दाख में भी स्थापित की जा चुकी है।

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