जयन्त प्रतिनिधि।
कोटद्वार : ऐतिहासिक नगरी दुगड्डा की बात हो और चूना धारा का जिक्र न हो, तो कहानी कुछ अधूरी सी लगती है। कभी संयुक्त गढ़वाल जनपद के प्रमुख व्यापारिक केंद्र रहे दुगड्डा की सांस्कृतिक, साहित्यिक और राजनीतिक चेतना में चूना धारा की भी अपनी अहम भूमिका रही है। ब्रिटिश दौर से लेकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन तक यह प्राकृतिक जलस्रोत लोगों की प्यास बुझाता रहा। लेकिन वर्तमान में यही ऐतिहासिक धरोहर भूस्खलन की चपेट में आकर अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है।

20वीं शताब्दी के चौथे दशक तक दुगड्डा संयुक्त गढ़वाल जनपद का प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। गढ़वाल के सीमांत गांव नीति-माणा तक खाद्यान्न की आपूर्ति दुगड्डा से होती थी। क्षेत्र में कुली बेगार प्रथा के विरोध और डोला-पालकी आंदोलन की अलख भी इसी नगरी से जली। गढ़वाल कमिश्नरी के जनक बैरिस्टर मुकंदीलाल के गढ़वाल आगमन के बाद दुगड्डा स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना। पं. जवाहरलाल नेहरू भी वर्ष 1936 और 1945 में दुगड्डा पहुंचे थे। सिलगाड और लंगूरगाड नदियों के मध्य बसे दुगड्डा में स्थित चूना धारा पिछले करीब सवा सौ वर्षों से लोगों की प्यास बुझा रही है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, वर्षों पहले पहाड़ी पर हुए भूस्खलन के बाद यह प्राकृतिक जलस्रोत अस्तित्व में आया था। ब्रिटिश शासनकाल में भी अधिकारी इस जलस्रोत का पानी पीते थे, वहीं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोग भी यहां अपनी प्यास बुझाते थे।
अब खुद संकट में है जलस्रोत
वर्तमान में चूना धारा की पहाड़ी पर लगातार भूस्खलन हो रहा है। पहाड़ी से मलबे के साथ बड़े-बड़े बोल्डर भी गिर रहे हैं। भूस्खलन के कारण दुगड्डा नगर पालिका की ओर से चूना धारा के आसपास कराया गया सौंदर्यीकरण कार्य पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि भूस्खलन का सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो प्राकृतिक जलस्रोत के अस्तित्व पर भी संकट गहरा सकता है। चूना धारा का संबंध केवल दुगड्डा की प्राकृतिक विरासत से नहीं, बल्कि नगर की पेयजल व्यवस्था से भी रहा है। वर्ष 1945 में दुगड्डा को नोटिफाइड एरिया घोषित किया गया था। इसके बाद वर्ष 1946 में चूना धारा से दुगड्डा नगर के लिए पेयजल लाइन बिछाई गई। इस लाइन के जरिए नगर में सार्वजनिक नलों तक पानी पहुंचाया जाता था। बाद में वन विभाग की ओर से ग्राम ऐता के लिए भी इसी जलस्रोत से लीज पर पेयजल लाइन बिछाई गई।
आंदोलनकारियों की भी बुझाई प्यास
चूना धारा ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन तक के कई दौर देखे हैं। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान दिल्ली कूच के लिए निकले कई आंदोलनकारियों ने यहां अपने वाहन रोके और जलस्रोत का पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। ऐसे में चूना धारा महज एक प्राकृतिक जलस्रोत नहीं, बल्कि दुगड्डा के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास की भी जीवंत निशानी है। अब जरूरत इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने की है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन को भूस्खलन प्रभावित पहाड़ी का जल्द भू-वैज्ञानिक परीक्षण करवाकर सुरक्षा के ठोस उपाय करने चाहिए, ताकि चूना धारा को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जा सके।