रुद्रपुर। उधम सिंह नगर जिला मुख्यालय में शुक्रवार को किसानों का आंदोलन उस समय तेज हो गया, जब भारतीय किसान यूनियन से जुड़े सैकड़ों किसान अपनी चार प्रमुख मांगों को लेकर कलेक्ट्रेट की ओर कूच कर गए। बड़ी संख्या में किसानों के पहुंचने से कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर माहौल गरमा गया। किसानों ने रास्ते में लगाई गई पहली बैरिकेडिंग को पार कर लिया, जिसके बाद पुलिस-प्रशासन ने दूसरी बैरिकेडिंग के पास सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी।दूसरी बैरिकेडिंग के आगे बढ़ने के बजाय किसान सड़क पर ही धरने पर बैठ गए। किसानों ने दरी बिछाकर अपना आंदोलन शुरू कर दिया। प्रदर्शन स्थल पर किसानों की ओर से लंगर की भी व्यवस्था की गई, जहां आंदोलन में शामिल किसानों ने सामूहिक रूप से भोजन किया।
21 से 23 अगस्त तक तीन
दिवसीय धरने का ऐलान
किसान नेताओं ने स्पष्ट किया कि आंदोलन केवल कुछ घंटों तक सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने 21 से 23 अगस्त तक तीन दिनों तक कलेक्ट्रेट गेट के बाहर धरना जारी रखने का ऐलान किया है। किसान नेताओं का कहना है कि जरूरत पड़ने पर प्रदर्शनकारी रात में भी मौके पर रुककर आंदोलन जारी रखेंगे।
किसानों के प्रदर्शन को देखते हुए कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास के क्षेत्रों में पुलिस बल की तैनाती बढ़ा दी गई। पुलिस और प्रशासन की ओर से सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के साथ ही प्रदर्शनकारियों से बातचीत के प्रयास किए जा रहे हैं।
बिजली से लेकर जमीन के मालिकाना हक तक चार प्रमुख मांगें
भारतीय किसान यूनियन की ओर से सरकार के सामने चार प्रमुख मांगें रखी गई हैं। किसानों की पहली मांग उत्तराखंड में घरेलू उपभोक्ताओं को 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने की है। किसान नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश के रूप में पहचान हासिल है, इसलिए राज्य के लोगों को इसका लाभ मिलना चाहिए। दूसरी प्रमुख मांग किसानों के ट्यूबवेल की बिजली का बिल माफ करने की है। किसानों का कहना है कि कृषि कार्यों में बिजली की लागत कम होने से उन्हें आर्थिक राहत मिल सकती है और खेती को बढ़ावा मिलेगा। तीसरी मांग बाजपुर क्षेत्र के 20 गांवों की जमीन से जुड़ी है। किसान इन गांवों के ग्रामीणों को जमीन का मालिकाना हक दिए जाने की मांग कर रहे हैं।
उनका कहना है कि लंबे समय से यह मामला ग्रामीणों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है और सरकार को इसका स्थायी समाधान करना चाहिए।
किसानों की चौथी प्रमुख मांग पेंशन बहाली को लेकर है। किसान नेताओं ने कहा कि इन मांगों को लेकर पहले भी सरकार और प्रशासन के समक्ष अपनी बात रखी गई, लेकिन अपेक्षित समाधान नहीं होने के कारण अब उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा है।