पुलिंडा को विस्थापन की आस, लगातार डरा रहा भूस्खलन

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विगम कई वर्षों से गांव के विस्थापन की मांग उठा रहे पुलिंडावासी
आपदा की दृष्टि से बेहतर संवेदनशील है घाड़ क्षेत्र का पुलिंडा गांव
जयन्त प्रतिनिधि।
कोटद्वार: विगत कई वर्षों से भूस्खलन का दंश झेल रहे पुलिंडा गांव के ग्रामीणों की आंखें विस्थापन की आस में पथरा गई हैं। लगातार भूस्खलन की जद में आ रहे इस गांव की शासन-प्रशासन सुध लेने को तैयार नहीं है। नतीजा ग्रामीण गांव से पलायन को मजबूर हो गए हैं। जबकि, पूर्व में गांव को पापीडांडा में विस्थापति करने की भी योजना बनाई गई थी। लेकिन, फाइल शासन में ही अटकी है।
जनपद में आपदा की दृष्टि से पुलिंड़ा गांव संवेदनशील है। वर्ष 1971 में यह गांव भूस्खलन की जद में आया। तब देखते ही देखते गांव के करीब 12 मकान भूस्खलन की भेंट चढ़ गए, जबकि अन्य कई मकानों में दरारें पड़ गई। इतना ही नहीं कई गोशाला भी ध्वस्त हुई। इस सब के बाद कई ग्रामीणों ने अपने आवास भूस्खलन जद से दूर तो बनाए, लेकिन हर बरसात में भूस्खलन का खतरा नए सिरे से बनाए मकानों तक पहुंचने का अंदेशा हमेशा बना रहता है। ग्रामीण कई बार विस्थापन की मांग को लेकर आंदोलन भी कर चुके हैं, लेकिन हर बार आश्वासन से आगे कुछ नहीं हुआ। हश्र यह हुआ कि कभी ड़ेढ़ सौ से अधिक परिवार वाले इस गांव से पलायन के चलते अब करीब पचास परिवार ही रह गए हैं। विस्थापन को हुए प्रयास उत्तर प्रदेश शासनकाल में वर्ष 1996 में भू-वैज्ञानिकों की एक टीम ने गांव का सर्वे कर अन्यत्र विस्थापित किए जाने की संस्तुति की। लेकिन, कोई फायदा नहीं हुआ। वर्ष 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के निर्देश पर तत्कालीन आयुक्त ने गांव को लैंसडौन वन प्रभाग के अंतर्गत पापीडांडा खाम में विस्थापित करने की संस्तुति कर दी। वन भूमि हस्तांतरण की कार्यवाही भी शुरू कर दी गई, लेकिन आज तक स्थिति पूर्ववत है। शासन को भेजी रिपोर्ट उप निदेशक, भूवैज्ञानिक भूतत्व एवं खनिजकर्म इकाई पौड़ी गढ़वाल की ओर से अतिसंवेदनशील ग्राम पुलिंठा का सर्वे कर अगस्त 2021 को जिलाधिकारी को अवगत कराते हुए पुलिंडा के समीप दो भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र को चिह्नित करते हुए परिवारों की संख्या का उल्लेख किया गया, जिसमें उनके द्वारा कुछ प्रभावितों की उनके नाम भूमि को उपयुक्त तो कुछ की उपयुक्त होना नहीं पाया बताया गया।

पापीडांडा में किया गया था सर्वें
पुलिंडा गांव के विस्थापन को लेकर पूर्व में पापीडांडा में सर्वे भी किया गया, लेकिन आज तक विस्थापन का यह मामला शासन-प्रशासन के बीच झूल रहा है। गांव के विस्थापन को लेकर पूर्व में कई आंदोलन भी हुए, लेकिन आश्वासन से आगे कुछ नहीं हुआ। आज तो कई परिवारों ने गांव ही छोड़ दिया है।

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