“हमारे छीने गए अधिकार वापस हों” : पांचवीं अनुसूची और जनजातीय दर्जे की मांग पर तेज हुआ जनआंदोलन

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– बागेश्वर पहुंचे उत्तराखंड एकता मंच के अध्यक्ष
बागेश्वर। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों को पांचवीं अनुसूची (5th Schedule) और जनजातीय प्रदेश का दर्जा दिए जाने की मांग अब जनआंदोलन का स्वरूप ग्रहण करती दिखाई दे रही है। इसी क्रम में उत्तराखंड एकता मंच के अध्यक्ष अनूप बिष्ट अपने प्रदेश भ्रमण कार्यक्रम के तहत सोमवार को बागेश्वर पहुंचे, जहां उन्होंने पत्रकार वार्ता कर राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक उत्तराखंड को पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत शामिल नहीं किया जाता, तब तक राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों का समग्र और संतुलित विकास संभव नहीं है।
पत्रकारों से बातचीत में अनूप बिष्ट ने कहा कि उत्तराखंड की मूल पहचान, संस्कृति, जल-जंगल-जमीन और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए पांचवीं अनुसूची का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उनका कहना था कि वर्तमान परिस्थितियों में पर्वतीय क्षेत्रों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक चुनौतियों का समाधान केवल विशेष संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने कहा कि आगामी वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों में वही राजनीतिक दल जनता का समर्थन प्राप्त करेगा, जो अपने घोषणा पत्र में पांचवीं अनुसूची और जनजातीय दर्जे की मांग को प्रमुखता से शामिल करेगा।
इस दौरान उन्होंने जनजागरण अभियान के तहत वितरित किए जा रहे पत्रकों का भी उल्लेख किया, जिनमें पर्वतीय क्षेत्रों के लिए पांचवीं अनुसूची लागू करने और जनजातीय दर्जा प्रदान करने के पक्ष में विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए गए हैं। अभियान में दावा किया गया है कि इस व्यवस्था से स्थानीय भूमि, प्राकृतिक संसाधनों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा सुनिश्चित होगी, साथ ही वन अधिकार अधिनियम (FRA-2006) और पेसा कानून (PESA-1996) जैसे महत्वपूर्ण प्रावधानों का लाभ भी प्रभावी रूप से मिल सकेगा। आंदोलन से जुड़े लोगों का मानना है कि इससे स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में अधिक अधिकार प्राप्त होंगे तथा अनियंत्रित जनसांख्यिकीय बदलावों पर भी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा।
अनूप बिष्ट ने कहा कि उत्तराखंड की विशिष्ट भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को देखते हुए राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों को विशेष संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि देश के अनेक अनुसूचित क्षेत्रों में इस प्रकार की व्यवस्थाओं ने स्थानीय समुदायों के अधिकारों और संसाधनों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इसलिए उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों को भी समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए।
कार्यक्रम में पूर्व दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री गोपाल दत्त भट्ट, एडवोकेट हरीश भट्ट, नरेन्द्र बिष्ट, सुंदर बरौलिया सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि यह केवल संवैधानिक दर्जे की मांग नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता, संस्कृति और भविष्य की रक्षा का प्रश्न है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने समय रहते इस दिशा में ठोस पहल नहीं की तो जनजागरण अभियान को और व्यापक रूप दिया जाएगा तथा आंदोलन को प्रदेशव्यापी स्वरूप प्रदान किया जाएगा।

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