पढ़िए: क्यों और कैसे होती है कोटद्वार के एसडीएम सहित उच्चाधिकारियों की मुखबरी

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जयन्त प्रतिनिधि।
कोटद्वार। किसी प्रशासनिक अधिकारी की गोपनीय रिपोर्ट भले ही सरकार अपनी एजेन्सी से कराती रहती है, लेकिन कोटद्वार एक ऐसी तहसील है जिसके मुखिया एसडीएम की मुखबरी अवैध धंधे वाले लोग करते रहते है। सामाजिक और आर्थिक अपराधों के कारण पौड़ी जिले को सुर्खियों में लाने वाली कोटद्वार तहसील में आजकल चोरी, डकैती और प्रोपर्टी के धंधे से बड़ा नया धंधा खनन का बन गया है। कोटद्वार में अब खनन को लेकर जो अवैध धंधा चल रहा है उसने शराब के अवैध धंधे को मात देते हुए कोटद्वार को सुर्खियों में लाने का बड़ा मौका दिया है।
कोटद्वार तहसील में पहाड़ से निकलकर बहने वाली खोह, सुखरो, मालन व सिगड्डी नदियों में उप खजिनों का ढेर खड़ा हो जाता है। जिससे यहां वैध और अवैध खनिज चुगान का बहुत बड़ा धंधा बन गया है। सरकार द्वारा जबकि पिछले तीन वर्षों से इन नदियों पर 15 से लेकर 45 और 60 दिनों के लिए वैध खनन का पट्टा दिया जाता है। बाकी के 305 दिन यहां पर नियमित रूप से अवैध खनन चलता रहता है। इस अवैध खनन को अंजाम देने के लिए खनन माफिया जहां पूरे सिस्टम को अपने अनुरूप ढालने की कोशिश करते है, लेकिन उच्चाधिकारियों तक न पहुंच पाने के कारण उनसे बचने के लिए एक खुफिया तंत्र स्थापित किया गया है।
अवैध खनन कारियों द्वारा निर्वाध रूप से खनन के लिए स्थापित किये गये खुफिया तंत्र उच्चाधिकारियों की लगातार मुखबरी (निगरानी) करता रहता है। यह खुफिया तंत्र इतना मजबूत होता है कि उच्चाधिकारियों एसडीएम, डीएफओ, सीओ आदि अधिकारियों के द्वारा अपने आवासों से बाहर निकलते ही उनकी पूरी सूचना पूरे क्षेत्र में अलर्ट कर देती है। ताकि अवैध खनन में लगे ट्रैक्टर ट्राली, ट्रक, जेसीबी आदि नदियों से हटकर किनारे की जा सकें। जिससे छापा मारने गये अधिकारियों को खाली हाथ बैरंग लौटना पड़ता है और वे ऐसी हालत में छापामारी करने से भी कतराने लगे है।

कैसे होती है अधिकारियों की मुखबरी
कोटद्वार में अवैध खनन माफियाओं के द्वारा उच्चाधिकारियों में एसडीएम कोटद्वार की मुखबरी का एक नमूना भर देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि खनन माफियाओं का कितना बड़ा नेटवर्क इस क्षेत्र में चल रहा है। एसडीएम कोटद्वार की मुखबरी करने के लिए उनके निवास के बाहर तहसील के सामने जिला सहकारी बैंक से लेकर पोस्ट ऑफिस तक दो व्यक्ति चौबीस घंटे तैनात रहते है। इनके अलावा दो-दो व्यक्ति झण्डाचौक, लालबत्ती चौराहा, कौड़िया चौराहा, सिम्बलचौड़ में खड़े रहते है। एसडीएम के अपने बदरीनाथ मार्ग स्थित तहसील परिसर आवास से निकलने पर वहां तैनात खनन माफिया के आदमी फोन से झण्डाचौक पर तैनात अपने आदमियों को खबर देते है कि एसडीएम निकल गये है। अब झण्डाचौक पर खड़े खनन माफिया के आदमी इस बात की निगरानी करते है कि एसडीएम झण्डाचौक से खोह नदी की तरफ या लालबत्ती चौराहे की ओर जा रहे है। उसके बाद वे एसडीएम की दिशा के अनुसार उस तरफ तैनात अपने मुखबिरों को सूचना करते है। उनके द्वारा संबंधित नदी में तैनात खनन माफिया के लोगों को सूचना दी जाती है। सूचना मिलने पर संबंधित नदी में चल रहा अवैध खनन एकाएक रूक जाता है और उस सड़क पर चलने वाले अवैध खनन के वाहन दाये-बांये हो जाते है। यही हाल डीएफओ आवास और सीओ आवास पर भी रहता है।

तीन साल से नहीं जलती तहसील के सामने की स्ट्रीट लाइट
एसडीएम कोटद्वार के आवास की निगरानी करने के लिए खनन माफिया के लोग उनके घर के बाहर तहसील के सामने मौजूद रहते है। चूंकि दिन में भीड़ होने के कारण उनकी पहचान करना मुश्किल रहता है, लेकिन रात को आठ बजे बाद जब लोगों का आवागमन बंद हो जाता है तो तब उनके दिखाई देने पर कोई भी शक पैदा कर सकता है इसलिए उन्हें अंधेरे की आवश्यकता होती है। अब इसे संयोग कहे या षडयंत्र, नगर निगम की तहसील के मुख्य द्वार के सामने की स्ट्रीट लाइट लगभग-लगभग साल भर में शिकायत करने पर एक या दो दिन ही जलती है बाकी दिनों वह बंद रहती है। जिससे खनन माफियाओं के लोग अंधेरे में छिपे बैठे रहते है और तहसील से निकलने वाले किसी भी अधिकारी को उनको पता नहीं लग पाता है।

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