पहाड़ की विलुप्त हो रही संस्कृति, बोली व व्यंजन को लेकर बने ठोस नीति

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नई टिहरी। पहाड़ की विलुप्त हो रही संस्कृति, बोली व व्यंजन को लेकर लोक कलाकारों ने चिता व्यक्त करते हुए कहा कि इनके संरक्षण के लिए सरकार को ठोस नीति बनानी चाहिए। गढ़वाली चित्राहार आवाज सुनो पहाड़ों की शूटिग के दौरान नए पर्यटक स्थलों को पहचान दिलाने के साथ ही गढ़वाली संस्कृति व भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए भी लोक कलाकारों ने पहल शुरू की है। एक होटल में पत्रकारों से बाचीत में उत्तराखंड धर्म संस्कृति प्रसार समिति के संरक्षक अनुसूया प्रसाद उनियाल व %आवाज सुनो पहाड़ों की% के निर्माता नरेंद्र रौथाण ने इस बात को लेकर चिता जताई कि पहाड़ की संस्कृति के संरक्षण को कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। इसके लिए सरकार को ठोस पहल करनी चाहिए। साथ ही पहाड़ों के प्रमुख पर्यटक स्थलों पर यहां की संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए। इसके अलावा यहां पर संग्रहालय बनाए जाने चाहिए, ताकि बाहर से आने वाले पर्यटक यहां की संस्कृति को समझ सके और इसका व्यापक प्रचार-प्रसार भी होगा। इसके अलावा उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की है कि प्रमुख पर्यटक स्थलों के होटल ढाबों में पहाड़ी व्यंजनों को अनिवार्य किया जाए। इसके अलावा पहाड़ के लोक वाद्य यंत्र ढोल, दमाऊ, रणसिघा, मशकबीन आदि से जुडे़ कलाकारों को प्रोत्साहन दिए जाने की मांग सरकार से की। इसके अलावा 45 वर्ष से अधिक उम्र के कलाकारों को पेंशन दिए जाने की मांग की। सुनो पहाड़ों की शूटिग जसपुर, उनियाल गांव, सुरकंडा, कद्दूखाल आदि जगहों पर की जा रही है। इस अवसर पर गुंजन कला केंद्र के अध्यक्ष सर्वेश्वर बिष्ट, पदम गुसाई, पूजा चौहान आदि मौजूद थे।

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