सचिव आपदा प्रबंधन ने प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों को भेजा पत्र
जयन्त प्रतिनिधि।
देहरादून : जनपद चमोली के ज्योतिर्मठ-मलारी मोटर मार्ग स्थित तमकनाला में 10 अगस्त 2026 को अत्यधिक जलप्रवाह एवं बड़ी मात्रा में मलबा आने की घटना को गंभीरता से लेते हुए सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने देश के प्रमुख वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थानों से घटना का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कराने का अनुरोध किया है।

इस संबंध में वाडिया हिमालयी भू-विज्ञान संस्थान, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी), भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (आईआईआरएस), उत्तराखण्ड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (यू-सैक), भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई), भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) तथा राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) के निदेशकों को पत्र भेजा गया है। संबंधित संस्थानों से तमकनाला के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र का अध्ययन कर अचानक बढ़े जल प्रवाह के वास्तविक स्रोत की पहचान करने को कहा गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट करने का अनुरोध किया गया है कि जल प्रवाह सामान्य वर्षा, अत्यधिक स्थानीय वर्षा, बादल फटने, तीव्र सतही बहाव अथवा किसी अन्य जल वैज्ञानिक कारण से उत्पन्न हुआ। नाले में आए अत्यधिक मलबे के स्रोत एवं उत्पत्ति क्षेत्र की पहचान के साथ ऊपरी क्षेत्र में भूस्खलन, भू-धंसाव, ढलान विफलता, चट्टानों के टूटने अथवा अन्य भू-आकृतिक गतिविधियों की भूमिका का भी परीक्षण करने को कहा गया है। सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने कहा कि ज्योतिर्मठ-मलारी मोटर मार्ग सीमावर्ती क्षेत्र से जुड़ा होने के साथ-साथ स्थानीय जनजीवन, आवागमन एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में घटना के कारणों एवं संभावित भविष्यगत जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन महत्वपूर्ण है। अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों का उपयोग भविष्य में सीमा क्षेत्र में सड़क, पुल एवं अन्य महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं की योजना, डिजाइन, निगरानी तथा आपदा प्रबंधन रणनीति को और अधिक प्रभावी बनाने में किया जा सकेगा। सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास ने संबंधित वैज्ञानिक संस्थानों से अपने-अपने विशेषज्ञता क्षेत्र के अनुसार अध्ययन एवं परीक्षण कर 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में प्राप्त वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर क्षेत्र में भविष्य के जोखिमों को कम करने एवं निगरानी तथा पूर्व चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आवश्यक कदमों पर भी विशेषज्ञ सुझाव प्राप्त होंगे।
आधुनिक तकनीकों से घटना का विश्लेषण
सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने बताया कि वैज्ञानिक अध्ययन में घटना से पूर्व एवं घटना के बाद क्षेत्र की स्थिति के तुलनात्मक आकलन के लिए उपग्रह चित्रों, उच्च रिजॉल्यूशन रिमोट सेंसिंग, ड्रोन सर्वेक्षण एवं जीआईएस आधारित विश्लेषण सहित आधुनिक तकनीकों का उपयोग करने का अनुरोध किया गया है। इसके साथ ही उपलब्ध उपग्रह एवं रडार आधारित वर्षा आंकड़ों, स्थानीय वर्षामापी केंद्रों तथा अन्य मौसम संबंधी आंकड़ों के आधार पर घटना के समय एवं उससे पूर्व ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा की प्रकृति, तीव्रता एवं अवधि का भी अध्ययन किया जाएगा।
भविष्य के जोखिमों का भी होगा आंकलन
संबंधित संस्थानों से क्षेत्र में संभावित भूस्खलन, रॉकफॉल, मलबा प्रवाह, फ्लैश फ्लड अथवा अन्य तीव्र भू-जल वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के प्रमाणों का वैज्ञानिक परीक्षण करने को कहा गया है। साथ ही हिमनद, हिमक्षेत्र, स्थायी अथवा अर्ध-स्थायी जल निकायों सहित ऐसे संभावित प्राकृतिक जल स्रोतों का भी अध्ययन करने का अनुरोध किया गया है, जिनसे अचानक जल प्रवाह में वृद्धि की संभावना हो सकती है।
अर्ली वार्निंग एवं रियल टाइम मॉनिटरिंग पर भी विशेषज्ञ राय
पत्र में ज्योतिर्मठ-मलारी मोटर मार्ग के उक्त हिस्से तथा आसपास के महत्वपूर्ण अवसंरचनात्मक स्थलों के लिए संभावित अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक जोखिमों का आकलन करने का अनुरोध किया गया है। साथ ही क्षेत्र में अर्ली वार्निंग सिस्टम, रियल टाइम मॉनिटरिंग, वर्षामापी एवं जलस्तर सेंसर, कैमरा आधारित निगरानी अथवा अन्य आधुनिक निगरानी तंत्र स्थापित किए जाने की आवश्यकता के संबंध में भी विशेषज्ञ राय उपलब्ध कराने को कहा गया है।