नई दिल्ली,। दवाओं की बढ़ती और पारदर्शिता से रहित कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गंभीर चिंता जताई। न्यायालय ने कहा कि अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) और खुदरा विक्रेता के लिए निर्धारित कीमत के बीच भारी अंतर आम आदमी पर आर्थिक बोझ डाल रहा है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि जब मरीजों को अस्पताल के भीतर मौजूद दवा विक्रेता से ही दवाएं खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, तो कीमतों में कई गुना अंतर का सवाल और गंभीर हो जाता है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक इंजेक्शन का उदाहरण देते हुए बताया कि उसकी अधिकतम खुदरा कीमत 22,437 रुपये है, जबकि खुदरा विक्रेता के लिए कीमत करीब 3,520 रुपये है। पीठ ने सवाल किया कि जब कोई मरीज यही दवा बाहर किसी विक्रेता से बहुत कम कीमत में खरीद सकता है, तो अस्पताल में उससे कई गुना अधिक राशि क्यों वसूली जाती है और इस अंतर की रकम आखिर किसकी जेब में जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों में एक समान व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया। पीठ ने पूछा कि औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) के तहत अधिकतम खुदरा मूल्य पर 16 प्रतिशत से अधिक का लाभांश क्यों नहीं सीमित किया जा सकता। पीठ के अनुसार, इससे अनावश्यक मुनाफाखोरी पर अंकुश लगाया जा सकता है और सरकारी योजनाओं के माध्यम से इलाज कराने वाले मरीजों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी कम हो सकता है।
यह सुनवाई दवाओं की कीमतों और आवश्यक दवाओं पर प्रभावी मूल्य नियंत्रण से जुड़े दो याचिकाओं पर हो रही थी। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ के समक्ष एक लिखित नोट प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने संबंधित नियामकीय व्यवस्था और उसके पीछे के कारणों को न्यायालय के समक्ष रखा है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी कार्यवाही में शामिल हुए।
तुषार मेहता ने कहा कि यदि न्यायालय अनुमति देता है तो वह संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक कर इस मामले का समाधान निकालने का प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था तलाशने की जरूरत है, जिससे सभी पक्षों के बीच संतुलन बना रहे।
पीठ ने निजी अस्पतालों का उल्लेख करते हुए कैंसर की एक दवा का उदाहरण दिया। न्यायालय को बताया गया कि इस दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य करीब 27,000 रुपये है, जबकि खुदरा विक्रेता के लिए इसकी कीमत लगभग 3,000 रुपये है। पीठ ने सरकार के अधिवक्ता से इस भारी अंतर की जांच करने को कहा।