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यूक्रेन जंग में रूसी सेना को जवाब देने के लिए आखिर क्घ्या है नाटो की सैन्य तैयारी

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नई दिल्ली, एजेंसी। यूक्रेन जंग में रूसी सेना के आक्रामक तेवर को देखते हुए नाटो ने भी जवाबी कार्रवाई के लिए कमर कस लिया है। खासकर क्रीमिया पुल के ध्घ्वस्घ्त होने के बाद रूसी सेना ने जिस तरह से यूक्रेनी शहरों पर मिसाइलों से हमला किया है, उसके बाद से नाटो और रूस आमने-सामने आ गए हैं। इस जंग में बेलारूस की सक्रियता से यह तनाव और बढ़ गया है। बेलारूस ने रूसी सेना के लिए जिस तरह से मदद का ऐलान किया है उससे नाटो और आक्रामक हो गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर नाटो की सैन्य ताकत क्घ्या है। यूक्रेन जंग को देखते हुए उसकी क्घ्या है तैयारी।
विदेश मामलों के जानकार प्रो हर्ष वी पंत का कहना है कि वास्तव में यूक्रेन युद्घ के पीटे असली वजह नाटो ही है। यूक्रेन का नाटो छ।ज्व् संगठन में दिलचस्घ्पी और अमेरिका के साथ उसकी निकटता के चलते रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कीव के खिलाफ युद्घ का ऐलान किया था।
यूक्रेन का अमेरिका के साथ सामरिक संबंध और नाटो की सदस्यता को लेकर रूस कई बार उसे धमका भी चुका था। रूस के विरोध के बावजूद यूक्रेन नाटो की सदस्यता को लेकर अड़ा रहा। इसका परिणाम एक महायुद्घ में तब्दील हो गया। यूक्रेन के बाद रूस ने फघ्निलैंड और स्वीडन को भी सावधान किया था। इन दोनों मुल्घ्कों ने भी नाटो में दिलचस्पी दिखाई थी।
प्रो पंत ने कहा कि यूक्रेन जंग में यदि बेलारूस, रूसी सेना की मदद में आता है तो इससे सटे तीन नाटो देश प्रभावति होंगे। इस युद्घ की आंच इन नाटो मुल्घ्कों तक आएगी और फिर नाटो का इस युद्घ में आना तय माना जा रहा है। दरअसल, 1949 में शीत युद्घ के दौरान नार्थ एटलांटिक ट्रीटी आर्गेनाइजेशन यानी नाटो अस्तित्घ्व में आया।
अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्रों का यह एक सैन्य गठबंधन है। इसमें शुरुआत में 12 मुल्क ही शामिल थे। नाटो संगठन का मूल सिद्घांत यह है कि यदि किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है तो बाकी देश उसकी मदद के लिए आगे आएंगे। इस संगठन का मूल उद्देश्घ्य दूसरे विश्व युद्घ के बाद रूस के यूरोप में विस्तार को रोकना था।
नाटो संगठन में अमेरिका के 13़50 लाख सैनिक तैनात हैं। नाटो संगठन में सर्वाधिक सैनिक अमेरिका के ही हैं। अगर नाटो यूक्रेन जंग में आगे आता है तो इसका सबसे ज्यादा प्रभाव अमेरिका पर ही पड़ेगा। ऐसे में यह जंग एक विश्व युद्घ में तब्घ्दील हो सकता है। हालांकि, नाटो के सदस्य देशों की सुरक्षा के नाम पर संगठन के सैनिकों ने रूस की पूरी घेराबंदी कर रखी है। रूस को सबसे बड़ी चिंता और डर यही है। ऐसे में रूस भी नाटो से सीधे पंगा नहीं लेना चाहेगा।
अमेरिका के अलावा इस संगठन में तुर्की के करीब साढ़े तीन लाख सैनिक मौजूद हैं। सैनिकों की संख्या के लिहाज से तीसरे स्थान पर फ्रांस है। फ्रांस के करीब दो लाख से ज्यादा सैनिक नाटो का हिस्सा हैं। इसके बाद चौथे नंबर पर जर्मनी है। इस मामले में पांचवे पर इटली और छठवें पर ब्रिटेन है। सेना की मौजूद्गी के लिहाज से देखा जाए तो इस संगठन में अमेरिका का वर्चस्व है।
प्रो पंत ने कहा कि यूक्रेन युद्घ के बाद छ।ज्व् की पूर्वी सीमाओं को मजबूत करने के लिए संगठन ने पोलैंड और रोमानिया में तीन हजार से ज्यादा जवान तैनात किए हैं। दोनों देशों की सीमा बेलारूस से मिलती है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा नाटो के 8,500 सैनिक हाई अलर्ट पर रहते हैं। यानी वह कभी भी मोर्चा संभालने की स्थिति में रहते हैं। नाटो सदस्घ्य देश यूक्रेन को सैन्घ्य समान भी मुहैया करा रहे हैं। करीब बीस करोड़ डालर से ज्यादा कीमत के हथियार भी नाटो ने यूक्रेन को भेजे हैं। इनमें जेवलिन एंटी टैंक मिसाइलें और स्टिंगर एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइलें हैं। इतना ही नहीं ब्रिटेन ने यूक्रेन को कम दूरी वाली दो हजार एंटी टैंक मिसाइलें दी हैं। ब्रिटेन ने पोलैंड में 350 सैनिक भेजे हैं।

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