नई दिल्ली , सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाका मामले में दोषी ठहराए गए इंडियन मुजाहिदीन के सदस्य अहमद बावा उर्फ अब्बू अबूबकर बरेलवी की मौत की सजा के अमल पर रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति एजी मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उसकी याचिका पर गुजरात सरकार को नोटिस जारी करते हुए निचली अदालत के अभिलेख भी तलब किए हैं।
अहमद बावा ने गुजरात हाई कोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें निचली अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा गया था। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले को गंभीर बताते हुए अदालत के समक्ष राज्य का पक्ष रखा। वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसे मुख्य रूप से कथित साजिश के आधार पर दोषी ठहराया गया है।
दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में आगे की सुनवाई के लिए गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया और अहमद बावा की फांसी की सजा के अमल पर रोक लगा दी। अब मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जारी रहेगी।
26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में कुछ ही घंटों के भीतर कई स्थानों पर सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। गुजरात हाई कोर्ट के जुलाई 2026 के विस्तृत फैसले के अनुसार, इन घटनाओं में 56 लोगों की मौत हुई और 240 से अधिक लोग घायल हुए थे। मामले में अहमदाबाद के साथ सूरत में बम रखने की घटनाओं से संबंधित मामलों की भी सुनवाई एक साथ की गई थी।
गुजरात हाई कोर्ट ने 7 जुलाई 2026 को दिए अपने फैसले में 49 दोषी ठहराए गए आरोपियों में से 38 को दी गई मौत की सजा की पुष्टि की थी, जबकि 11 दोषियों की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी गई। अदालत के अभिलेख के अनुसार, निचली अदालत ने 28 आरोपियों को बरी किया था।
इस मामले में गुजरात की विशेष अदालत ने 18 फरवरी 2022 को फैसला सुनाया था। 49 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए 38 को मौत की सजा और 11 को आजीवन कारावास दिया गया था। इसके बाद मौत की सजा की पुष्टि और दोषियों की अपीलों पर गुजरात हाई कोर्ट में सुनवाई हुई।
गुजरात हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सिलसिलेवार धमाकों की व्यापक साजिश, बड़ी संख्या में लोगों की मौत और आतंक फैलाने के उद्देश्य समेत मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से विचार किया था। अब अहमद बावा से संबंधित मौत की सजा का मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है और शीर्ष अदालत के अगले आदेश तक उसकी सजा पर अमल नहीं किया जा सकेगा।