नईदिल्ली, दिल्ली में सरकारी आवास से बेहिसाब नकदी मिलने के मामले में फंसे इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आरोपों की जांच पूरी हो गई है। मामले की जांच कर रही न्यायाधीश जांच समिति ने मंगलवार को संसद भवन में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। रिपोर्ट को दोनों सदनों के पटल पर रखा जाएगा। संभावना जताई जा रही है कि आगामी मानसून सत्र में इस पर बहस हो सकती है। समिति में शामिल सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति चंद्रशेखर और कर्नाटक हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य ने बिरला को रिपोर्ट सौंपी है। समिति में पहले मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव शामिल थे, जो 5 मार्च को सेवानिवृत्त हो गए, जिसके बाद न्यायमूर्ति चंद्रशेखर को समिति में शामिल किया गया। समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने 12 अगस्त 2025 को किया था।
न्यायमूर्ति वर्मा ने अप्रैल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर अपना इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने लिखा, मैं आपके सम्मानित कार्यालय को उन कारणों से बोझिल नहीं करना चाहता, जिनके कारण मुझे यह पत्र प्रस्तुत करना पड़ा है, मैं अत्यंत पीड़ा के साथ हाई कोर्ट के न्यायाधीश के पद से तत्काल प्रभाव से अपना त्यागपत्र दे रहा हूं। इस्तीफे के बाद न्यायमूर्ति वर्मा को प्राप्त संवैधानिक प्रतिरक्षा समाप्त हो गई है। ऐसे में उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू होगी।
दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश रहते हुए न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास के स्टोर रूम में 14 मार्च, 2025 को आग लगी थी। वर्मा की अनुपस्थिति में उनके परिवार ने अग्निशमन-पुलिस बुलाई। आग बुझाने के बाद टीम को घर से भारी मात्रा में नकदी मिली। इसकी जानकारी तत्कालीन सीजेआई संजीव खन्ना को हुई तो उन्होंने कॉलेजियम बैठक बुलाकर न्यायमूर्ति वर्मा का स्थानांतरण इलाहाबाद कोर्ट कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा को दोषी ठहराया।