पार्थसारथि थपलियाल
हिन्दू जीवन-दर्शन में मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक अवस्था का परिवर्तन मानी गई है। भगवदगीता में श्रीकृष्ण कहते हैं-वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि, तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही। अर्थात जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही देही पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर ग्रहण करता है। जब आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर में चली जाती है, तब स्वाभाविक जिज्ञासा उत्पन्न होती है- यदि हमारा कोई पूर्वज पुनर्जन्म ले चुका है, तो हम श्राद्ध किसे अर्पित करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए सबसे पहले आत्मा और पितर के अंतर को समझना आवश्यक है। भारतीय दर्शन में आत्मा को नित्य, अविनाशी और देह से भिन्न माना गया है। मृत्यु शरीर की होती है, आत्मा की नहीं। पितृ शब्द एक व्यापक पारिवारिक और धार्मिक अवधारणा है, जिसके अंतर्गत हमारे दिवंगत पूर्वजों की स्मृति, उनकी परंपरा और हमारे ऊपर उनके उपकार का भाव सम्मिलित है। तैत्तिरीय उपनिषद् में “देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण” जैसी उत्तरदायित्व-बोधक परंपरा दिखाई देती है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति में श्राद्ध, पितृयज्ञ, पात्रता और विधि का अधिक व्यवस्थित वर्णन मिलता है। गरुड़पुराण तथा विभिन्न धर्मशास्त्रीय निबंधों में मृत्यु के बाद की अवस्थाओं, प्रेतावस्था और श्राद्ध के संबंध पर विस्तार है। दूसरी ओर, उपनिषदों और भगवदगीता में आत्मा, कर्म और पुनर्जन्म पर अधिक दार्शनिक बल है। यही कारण है कि श्राद्ध का उद्देश्य आत्मा को भोजन पहुँचाना मात्र नहीं है। ‘श्राद्ध’ शब्द ही ‘श्रद्धा’ से बना है। अर्थात श्रद्धा और कृतज्ञता से किया गया कर्म श्राद्ध है। हम अपने पूर्वजों के प्रति उस ऋण को स्वीकार करते हैं, जिसे भारतीय चिंतन ने पितृऋण कहा है। हमें शरीर, संस्कार, भाषा, परिवार, ज्ञान, परंपरा और जीवन की अनेक सुविधाएँ पूर्वजों से मिली हैं। श्राद्ध उनके प्रति इसी कृतज्ञता का धार्मिक रूप है। भारतीय शास्त्रों में मृत्यु के बाद की अवस्थाओं के संबंध में अनेक सूक्ष्म धारणाएँ मिलती हैं। ‘प्रेत’ की अवधारणा भी एक विशेष संक्रमण-अवस्था से संबंधित है, गरुड़पुराण और कुछ धर्मशास्त्रीय परंपराएँ मृत्यु के बाद प्रेतावस्था तथा सपिंडीकरण के माध्यम से पितृलोक में प्रतिष्ठा का वर्णन करती हैं, पर इन विवरणों को सभी हिंदू दार्शनिक परंपराएँ समान रूप से स्वीकार नहीं करतीं। भगवदगीता (2.22) देह-परिवर्तन का रूपक देती है और (8.6) अंतकालीन स्मरण तथा कर्म-संस्कारों के संबंध की चर्चा करती है। बृहदारण्यक और छांदोग्य उपनिषदों में कर्म के अनुसार विभिन्न गतियों तथा पुनर्जन्म की धारणाएँ मिलती हैं। वहीं कुछ उपनिषद् आत्मज्ञान को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का मार्ग बताते हैं। इसलिए “हर मृत व्यक्ति तुरंत किसी नए शरीर में जन्म लेता है” या “हर मृत व्यक्ति लंबे समय तक पितृलोक में ही रहता है”- दोनों को सभी ग्रंथों का निर्विवाद निष्कर्ष कहना उचित नहीं होगा।

तर्पण का शाब्दिक अर्थ है-
तृप्त करना, संतुष्ट करना। जल अर्पित करते समय मनुष्य अपने पितरों का स्मरण करता है और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है। यह आवश्यक नहीं कि तर्पण का अर्थ यह समझा जाए कि जल भौतिक रूप से किसी अदृश्य व्यक्ति तक पहुँच रहा है। धार्मिक कर्म का महत्व उसके पीछे स्थित भाव, संकल्प और श्रद्धा में भी निहित है। यदि कोई पूर्वज पुनर्जन्म ले चुका हो, तब भी श्राद्ध की सार्थकता समाप्त नहीं होती। क्योंकि वंशानुगत उस देह का संस्कार सूक्ष्म स्मृति स्वरूप हमारे साथ है। अत: जिस तिथि को किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है अश्विनि मास के कृष्णपक्ष में (श्राद्ध पक्ष में) उसी तिथि को उस व्यक्ति का श्राद्ध किया जाता है। दार्शनिक या प्रतीकात्मक दृष्टि से यह उस संबंध का स्मरण है जो जैविक वंश, संस्कार और सामाजिक उत्तराधिकार के माध्यम से बना रहता है। जैसे हम किसी महान व्यक्ति की स्मृति में स्मारक बनाते हैं, उनके नाम से पुस्तकालय या छात्रवृत्ति स्थापित करते हैं अथवा उनकी जयंती मनाते हैं, वैसे ही श्राद्ध पारिवारिक स्तर पर पूर्वजों की स्मृति को जीवित रखने की सनातन व्यवस्था है। हमारा अस्तित्व अकेले हमारा बनाया हुआ नहीं है, उसमें अनेक पीढ़ियों का योगदान समाहित है। श्राद्ध अंधविश्वास नहीं, कृतज्ञता है, केवल मृतक की चिंता नहीं, बल्कि पूर्वजों से प्राप्त जीवन-मूल्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प है। श्राद्ध उस आत्मा को भोजन कराने का कर्म नहीं, जिसे हम उसकी वर्तमान देह में खोज रहे हैं, यह उस पितृपरंपरा के प्रति श्रद्धांजलि है, जिसके कारण हम आज अस्तित्व में हैं। “हम अपने पूर्वजों को केवल स्मरण नहीं करते, उनके ऋण को स्वीकार करते हैं और उनके द्वारा प्राप्त जीवन-परंपरा को आगे ले जाने का संकल्प करते हैं।”