देहरादून। उत्तराखंड सरकार की कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य से जुड़े उत्पीड़न और कथित जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल के मामले में उनके पति गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी को अदालत से राहत नहीं मिली है। गिरफ्तारी की आशंका के बीच दाखिल उनकी अग्रिम जमानत याचिका को देहरादून की अदालत ने खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई और विशेष जांच दल (एसआईटी) के रुख को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध की ओर संकेत करते हैं। ऐसे में अधिनियम की धारा 18 और 18ए के तहत अग्रिम जमानत पर लागू प्रतिबंध इस मामले में प्रासंगिक है। यह आदेश पांचवीं अपर सत्र न्यायाधीश एवं एससी-एसटी एक्ट की विशेष न्यायाधीश अंजलि बेंजवाल की अदालत ने दिया। अदालत ने कहा कि जब प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों से प्रथम दृष्टया एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध बनता दिखाई देता है, तो इस स्तर पर अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।
मामले के अनुसार, कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य ने 15 अक्टूबर को देहरादून के कैंट थाने में अपने पति गिरधारी लाल साहू के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शिकायत में जान से मारने का आपराधिक षड्यंत्र रचने और एससी-एसटी एक्ट से संबंधित आरोप लगाए गए हैं। प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि आवास पर मौजूद स्टाफ के सामने गिरधारी लाल साहू ने रेखा आर्य के लिए कथित तौर पर जातिसूचक और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। एफआईआर में कथित घटना का समय वर्ष 2004 बताया गया है। इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होना है। अग्रिम जमानत की मांग करते हुए बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि रेखा आर्य और गिरधारी लाल साहू करीब 22 वर्षों से पति-पत्नी हैं और उनके बीच घरेलू तथा आर्थिक मामलों को लेकर विवाद चल रहा है।
-ब आगे क्या? एसआईटी की कार्रवाई पर निगाहें
अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद मामले में जांच और संभावित आगे की कानूनी कार्रवाई महत्वपूर्ण हो गई है। अब निगाहें जांच एजेंसी के अगले कदम पर टिकी हैं। हालांकि, अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने का अर्थ अपने आप दोष सिद्ध होना नहीं है। मामले में आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगी।