-भारत की कूटनीतिक भूमिका होगी और मजबूत
नईदिल्ली, वैश्विक कूटनीति के मंच पर भारत बेहद व्यस्त और महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगस्त-सितंबर में एक डिप्लोमैटिक मैराथन (राजनयिक अभियान) पर रहेंगे, जिसमें वे एक महीने में 3 बड़े बहुपक्षीय शिखर सम्मेलनों में हिस्सा लेंगे। किर्गिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के बाद भारत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा और फिर न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में संबोधन के साथ इसका समापन होगा। आइए इन यात्राओं की अहमियत जानते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी के इस कूटनीतिक सफर की शुरुआत किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में होने वाले एससीओ शिखर सम्मेलन से होगी।
इसके सदस्य देशों में भारत के साथ चीन, रूस, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान और बेलारूस शामिल हैं।
मूल रूप से क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद-विरोधी गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करते हुए स्थापित इस समूह ने अपने एजेंडे में संपर्क, ऊर्जा सहयोग, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषयों को भी शामिल किया है।
भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन प्रमुख यूरेशियाई शक्तियों के साथ आतंकवाद, उग्रवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा और संपर्क जैसे मुद्दों पर चर्चा करने का अवसर प्रदान करता है।
यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उन देशों के नेता एक साथ आ रहे हैं जिनके साथ भारत के जटिल द्विपक्षीय संबंध हैं, जिनमें चीन और पाकिस्तान शामिल हैं।
इसके साथ ही दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार रूस भी शामिल है। इससे भारत अपनी पैठ बढ़ाना चाहेगा।
किर्गिस्तान से लौटने के कुछ ही दिनों बाद पूरा वैश्विक ध्यान भारत की राजधानी नई दिल्ली पर केंद्रित हो जाएगा, जहां भारत अपनी अध्यक्षता में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा।
भारत ने इस वर्ष की अध्यक्षता के लिए लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण विषय को अपनाया है।
ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका द्वारा गठित इस समूह का काफी विकास हुआ है। इसमें पश्चिम एशिया और अफ्रीका के अतिरिक्त सदस्य भी शामिल हुए हैं।
ब्रिक्स समूह में पश्चिम एशिया और अफ्रीका के नए देशों के जुड़ने के बाद यह अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संसाधनों का एक बहुत बड़ा केंद्र बन चुका है।
भारत इस मंच के जरिए विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की मजबूत आपूर्ति श्रृंखला, डिजिटल नवाचार, जलवायु कार्रवाई और ग्लोबल साउथ की चिंताओं को प्रमुखता से उठाएगा।
इस सम्मेलन की मेजबानी से भारत उच्च स्तरीय राजनयिक गतिविधियों के केंद्र में आएगा क्योंकि कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष द्विपक्षीय वार्ता के लिए आएंगे।
इस व्यस्त अभियान का अंतिम पड़ाव न्यूयॉर्क होगा, जहां प्रधानमंत्री मोदी यूएनजीए के 80वें सत्र को संबोधित करेंगे।
इसमें भारत वैश्विक संघर्षों, मानवीय संकटों और जलवायु परिवर्तन जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के बीच वैश्विक शासन संस्थानों, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनजीए) में सुधारों की अपनी पुरानी मांग को दोहराएगा।
यह संबोधन 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सदस्यता के अभियान को भी मजबूती देगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह वैश्विक कार्यक्रम दिखाता है कि भारत किसी एक भू-राजनीतिक गुट पर निर्भर रहने के बजाय बहु-आयामी साझेदारी की नीति पर चलता है।
एक तरफ एससीओ यूरेशियाई सुरक्षा पर केंद्रित है, वहीं ब्रिक्स उभरती अर्थव्यवस्थाओं के आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देता है।
इसी तरह यूएनजीए दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे प्रतिनिधित्व वाला मंच है।
आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई, डिजिटल परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा आदि पर भारत इन तीनों मंचों के जरिए वैश्विक एजेंडा तय करेगा।