शिक्षकों की क्षमता संवर्धन पर दो दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला शुरू

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जयन्त प्रतिनिधि।
श्रीनगर गढ़वाल : हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल एवं शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के सहयोग से चौरास परिसर स्थित अकादमिक गतिविधि केंद्र में दो दिवसीय कार्यशाला शुरू हो गई है। उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के संकाय सदस्यों, अकादमिक विशेषज्ञों तथा शोधार्थियों ने प्रतिभाग किया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य 22 भारतीय भाषाओं में विद्यालयी एवं उच्च शिक्षा के लिए संवादात्मक डिजिटल पुस्तकों के रूप में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षण सामग्री विकसित करना है। इस पहल का उद्देश्य बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहित करना, गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री तक विद्यार्थियों की पहुंच बढ़ाना तथा देशभर में ज्ञान को अधिक सुलभ बनाना है।


अपने संबोधन में मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. प्रकाश सिंह ने भारत की समृद्ध बौद्धिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन में इस पहल के महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पुस्तकें लिखकर व्यक्ति अमृत पिए बिना भी अमर हो सकता है। पुस्तकों को हमारी अमूल्य धरोहर बताते हुए उन्होंने भारतीय भाषाओं में शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रयास से शिक्षा का विस्तार होगा तथा समाज के व्यापक वर्ग तक ज्ञान की पहुंच सुनिश्चित की जा सकेगी। कुलपति ने भारतीय ज्ञान परंपराओं की विविधता, उनके ऐतिहासिक विकास, देश की समृद्ध बौद्धिक विरासत पर भी प्रकाश डाला। कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि इसके पंद्रहवें अध्याय में अनुसंधान पद्धति पर चर्चा की गई है, जो प्राचीन भारतीय साहित्य में निहित ज्ञान की गहराई और समृद्धि को दर्शाता है। उन्होंने ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने तथा उन्हें व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया। विषय विशेषज्ञ डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने भारतीय भाषाओं के संवर्धन में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए प्रौद्योगिकी आधारित बहुभाषी सामग्री के विकास के माध्यम से एक संपूर्ण उद्योग विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद केवल शब्दों के रूपांतरण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मूल रचनाओं की अवधारणाओं, अर्थ और मूल भावना को भी सुरक्षित रखा जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस पहल की घोषणा केंद्रीय बजट 2025 में की गई थी, जिसके अंतर्गत 2.5 लाख पुस्तकों के विकसित किए जाने का प्रस्ताव है। इस अवसर पर कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. आलोक सागर गौतम, डॉ. कविता भट्ट, प्रो. आर. एस. नेगी, प्रो. सीमा धवन, प्रो. डी. एस. नेगी, प्रो. एम. एस. नेगी, प्रो. सुरेंद्र सिंह बिष्ट, प्रो. बी. पी. नैथानी, बिड़ला परिसर के निदेशक प्रो. हरभजन सिंह चौहान, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के अकादमिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव, प्रो. नारायण दत्त (पूर्णकालिक राज्य समन्वयक, उत्तराखंड), डॉ. अलका सूरी (राज्य समन्वयक, भारतीय भाषा समिति), डॉ. रचना विश्वकर्मा (अकादमिक समन्वयक), डॉ. सुधांशु भूषण (अकादमिक समन्वयक), डॉ. आलोक सागर गौतम (समन्वयक) ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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