विलुप्त की कगार पर गिद्घ, संरक्षण में जुटा शिक्षक

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पंकज पसबोला
कोटद्वार। उत्तराखण्ड के जनपद पौड़ी गढ़वाल में विलुप्त होने की कगार पर पहुंचे गिद्घों के संरक्षण के लिए पक्षी प्रेमी शिक्षक दिनेश चन्द्र कुकरेती आगे आये है। शिक्षक ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को गिद्घों के संरक्षण के लिए जागरूक कर रहे है। शिक्षक श्री कुकरेती अवकाश के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में गोष्ठियों के माध्यम से लोगों को जागरूक करते है। वह रिखणीखाल, नैनीडांडा और द्वारीखाल ब्लॉक में पहाड़ियों में गिद्घों के अड्डों को पुन: जीवित करने हेतु कार्य कर रहे है। शिक्षक का कहना है कि गिद्घों के संरक्षण के लिए जल्द ही कदम नहीं उठाये गये तो गिद्घों के विलुप्त होने में समय में नहीं लगेगा। क्योंकि गिद्घ की कुछ प्रजातियां विलुप्त हो गई और कुछ विलुप्त होने की कगार पर है।
पौड़ी जनपद में विलुप्त होने की कगार पर पहुंचे गिद्घों के स्थायी अड्डों में भारी कमी आई है। प्रकृति के सफाई कर्मी और खाद्य शृंखला में अहम भूमिका निभाने वाले गिद्घ अब बड़ी मुश्किल से दिखाई देते है। कीटनाशक दवाईयों का उपयोग गिद्घों के लिए विनाश का कारण बनी हुई है। करीब 20 वर्ष पहले तक गिद्घ आसानी से दिखाई देते थे, किंतु अब यह दुर्लभ हो गया हैं। पौड़ी जिले के खिणीखाल ब्लॉक के राजकीय इंटर कॉलेज द्वारी पैनों में कार्यरत शिक्षक दिनेश चंद्र कुकरेती वर्ष 2010 से गिद्घ संरक्षण को लेकर लोगों को जागरूक करने में लगे हुए है। वह गोष्ठियों के माध्यम से लोगों को गिद्घ संरक्षण की जानकारी देते है। उनके संरक्षण का असर है कि रिखणीखाल, नैनीडांडा और द्वारीखाल ब्लॉक में गिद्घों की संख्या बढ़ रही है। शिक्षक दिनेश चंद्र कुकरेती का कहना है कि 1980 के दशक में उत्तराखण्ड में गिद्घों के 300 से अधिक स्थाई अड्डे थे ऊंचे चट्टानों में थे और हजारों की संख्या में गिद्घ थे। जो उच्च हिमालय से तलहटी हिमालय क्षेत्र में रहते थे और मैदानी क्षेत्र तक आते थे। 1987 से 1991 तक इनकी संख्या में 90 प्रतिशत तक की कमी हुई और वर्ष 2022 तक यह बढ़कर 99 प्रतिशत हो गया। जहां गिद्घों के स्थाई अड्डों की संख्या पहले 300 से अधिक थी जो अब 15 के आसपास रह गई है। पहले अस्थाई अड्डो की संख्या 600 से अधिक थी जो घटकर 50 के आसपास रह गई है। पहले गिद्धों के 200 से अधिक झुण्ड थे जो अब 10 के आसपास रह गये है। गिद्घ की कुछ प्रजातियां विलुप्त हो गई और कुछ विलुप्त होने की कगार पर है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1987 से 1991 के बीच ग्रामीणों द्वारा जंगली जानवरों को मारने हेतु मृत मवेशियों में कीटनाशक दवाईयों का प्रयोग किया गया, जिस कारण गिद्धों के झुण्ड समाप्त हो गये। वर्तमान में गिद्घ की कुछ प्रजातियां विलुप्त हो गई और कुछ विलुप्त होने की कगार पर है। शिक्षक श्री कुकरेती के अनुसार जंगलों में आग लगने की वजह से गिद्घ विचलित हो रहे है और यह वर्ष 2000 से भोेजन की कमी से जूझ रहे है तथा भोजन की तलाश में इन्हें लंबा सफर तय करना पड़ रहा है। पहले गिद्धों की 9 से 10 प्रजातियां दिखाई देती थी, लेकिन बि 3 से 4 शेष रह गई है। वर्तमान में सर्वाधिक खाकी रंग के गिद्ध दिखाई देते है। यदि समय रहते गिद्घों के संरक्षण के लिए कार्य नहीं किया गया तो ये प्रजाति भी विलुप्त हो सकती है।

कम हो रहा गिद्घों का प्रातवास
गिद्घ ऊंचे पेड़ों पर अपना आशियाना बनाते हैं। इनका सबसे पसंदीदा आवास सेमल के पेड़ होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में सेमल के पेड़ों का बड़े पैमाने पर कटान हुआ है। जिससे गिद्घों का प्राकृतिक आवास छिन रहा है। शिक्षक दिनेश चंद्र कुकरेती का यह मानना है कि गिद्घों और दूसरे परिंदों को बचाने के लिए पेड़ों को बचाया जाना बेहद जरूरी है। क्योंकि गिद्घ हमारी प्रकृति का अहम हिस्सा है, लेकिन इस पक्षी की कई प्रजातियां आज लुप्त होने की कगार पर हैं। उन्होंने कहा कि कीटनाशक दवाईयों का प्रयोग नहीं करना चाहिए, वनों में आग न लगाये और मृत मवेशियों को गिद्ध के भोजन हेतु सुरक्षित स्थान पर रखें।

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