असली मुद्दा परिसीमन है, न कि महिला आरक्षण : सोनिया गांधी

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नई दिल्ली , कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य सोनिया गांधी ने सोमवार को केंद्र सरकार के प्रस्तावित विशेष सत्र और उससे जुड़े विधेयकों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस समय असली मुद्दा महिला आरक्षण नहीं बल्कि परिसीमन है, जिसे उन्होंने ‘बेहद खतरनाक’ और ‘संविधान पर हमला’ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जाति जनगणना को टालने और पटरी से उतारने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक, जिस तरह और जिस समय संसद का विशेष सत्र बुलाया जा रहा है, उससे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। द हिंदू अखबार में प्रकाशित अपने लेख में सोनिया गांधी ने लिखा कि प्रधानमंत्री विपक्षी दलों से उन विधेयकों का समर्थन मांग रहे हैं, जिन्हें सरकार तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के चरम के दौरान विशेष सत्र में जल्दबाजी में पास कराना चाहती है। उन्होंने कहा कि इस असाधारण जल्दबाजी के पीछे केवल एक ही कारण हो सकता है। वह यह कि राजनीतिक फायदा उठाना और विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में लाना।
सोनिया गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री हमेशा की तरह पूरी सच्चाई नहीं बता रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष ने कभी भी महिला आरक्षण को जनगणना से जोड़ने की मांग नहीं की थी बल्कि विपक्ष चाहता था कि इसे 2024 के लोकसभा चुनाव से ही लागू किया जाए।
उन्होंने नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 का जिक्र करते हुए बताया कि सितंबर 2023 में विशेष सत्र के दौरान संसद ने इसे सर्वसम्मति से पारित किया था। इस कानून के तहत संविधान में अनुच्छेद 334-ए जोड़ा गया, जिसमें लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है। हालांकि, इसे अगली जनगणना और उसके आधार पर होने वाले परिसीमन के बाद लागू करने की शर्त रखी गई।
सोनिया गांधी ने कहा कि यह शर्त विपक्ष की मांग नहीं थी। उन्होंने बताया कि राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था कि महिला आरक्षण 2024 के चुनाव से ही लागू होना चाहिए लेकिन सरकार ने इसे नहीं माना।
उन्होंने सवाल उठाया कि अब जब सरकार यह संकेत दे रही है कि अनुच्छेद 334-ए में संशोधन कर महिला आरक्षण को 2029 से लागू किया जा सकता है तो इसमें 30 महीने का समय क्यों लगा? और कुछ हफ्ते इंतजार कर सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुलाई जा सकती थी।
सोनिया गांधी ने यह भी बताया कि विपक्षी नेताओं ने तीन बार केंद्र सरकार को पत्र लिखकर 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में चुनाव के अंतिम चरण के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाने का अनुरोध किया था, ताकि सरकार के प्रस्तावों पर विस्तार से चर्चा हो सके। हालांकि सरकार ने इस वाजिब मांग को ठुकरा दिया।
उन्होंने कहा कि इसके बजाय प्रधानमंत्री लेख लिखकर, राजनीतिक दलों से अपील कर और सम्मेलन आयोजित कर अपनी बात आगे बढ़ा रहे हैं, जो ‘एकतरफा रवैया’ और ‘मेरी मर्जी या कुछ नहीं’ जैसी कार्यशैली को दर्शाता है।
सोनिया गांधी ने अधिक संवाद और सहमति आधारित प्रक्रिया की जरूरत पर जोर देते हुए 1993 में हुए 73वें और 74वें संविधान संशोधन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि इन संशोधनों के जरिए पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को आरक्षण देने से पहले लगभग पांच साल तक व्यापक चर्चा की गई थी। इसका श्रेय उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को दिया।
उन्होंने बताया कि आज देश में करीब 15 लाख महिला जनप्रतिनिधि स्थानीय निकायों में कार्यरत हैं, जो कुल का 40 प्रतिशत से अधिक हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी मजबूत आधार पर खड़ा है।
जनगणना में देरी को लेकर भी सोनिया गांधी ने सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि 2021 में होने वाली जनगणना को टाल दिया गया, जिससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत मिलने वाले लाभ से 10 करोड़ से ज्यादा लोग वंचित रह गए। यही कानून प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की आधारशिला है।
उन्होंने कहा कि जनगणना की प्रक्रिया पांच साल की देरी के बाद अब शुरू की गई है। ऐसे में 2027 की जनगणना को लेकर सरकार की जल्दबाजी समझ से परे है। सरकार इसे ‘डिजिटल जनगणना’ बता रही है और अधिकारियों के अनुसार इसके अधिकांश आंकड़े 2027 में ही उपलब्ध हो जाएंगे। ऐसे में विशेष सत्र बुलाने और परिसीमन कराने की जल्दी के पीछे दिए जा रहे तर्क ‘खोखले’ हैं।
सोनिया गांधी ने जाति जनगणना के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि करीब एक साल पहले प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि 2027 की जनगणना में जाति आधारित गणना भी होगी, जबकि इससे पहले सरकार सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर और संसद में बयान देकर इसका विरोध कर चुकी थी।
उन्होंने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री ने जाति जनगणना की मांग करने वाले कांग्रेस नेताओं को ‘अर्बन नक्सल मानसिकता’ से ग्रसित बताया था। उन्होंने कहा कि अब 2027 की जनगणना सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण को मजबूती देने के लिए जाति आधारित आंकड़े जुटाने वाली है।
उन्होंने कहा कि बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों ने महज छह महीने में जाति सर्वे पूरा कर लिया, जिससे यह साफ होता है कि इसमें देरी का कोई ठोस कारण नहीं है। उनके मुताबिक, यह कहना गलत है कि जाति जनगणना से 2027 की जनगणना में देरी होगी बल्कि सरकार का असली इरादा इसे और टालना है।

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